हरियाणा की बेटियों के विषय में कुछ चौंकाने वाले सत्य

किसी भी समाज में या देश में लड़कियों की भूमिका उतनी ही महतवपूर्ण होती है जितनी की लड़कों की |जब तक हम अपने देश में इस लिंग अनुपात को सही तरीके से बेलेंस नहीं करेंगे ,अपनी सोच में बदलाव नहीं करेंगे तब तक अपने समाज और देश में ये अंतर हमेशा ही रहेगा |नारी-जाति आधी मानव जाति है इस बात को जानते हुए भी दिनों-दिन लिंग अनुपात बहुत तेज़ी से बढ़ रहा है |आज अपने पहले ही लेख (आलेख) में मैं अपने हरियाणा में हो रहे लिंग अनुपात पर बात करने आई हूँ ….

2014 में हरियाणा के कई गाँवों में एक भी बेटी नहीं जन्मी

पूरे हरियाणा में ‘बेटी बचाओ,बहु लाओ जैसी बहुत बड़ी बड़ी बातें पोस्टरों में बैनरों में लिखी हुई पढने को मिल जाएँगी पर यहाँ स्थिति इस से एक दम उलट रहती है |
बहुत हॉस्पिटलों के बहार बड़े अक्षरो में लिखा रहता है कि यहाँ गर्भ परीक्षण नहीं होता पर पीछे के दरवाजे से ऐसे परीक्षण होते ही रहते है और बेटियो को गर्भ में ही मारने की नई नई पद्धतियाँ भी बहुत बड़े पैमाने में उपलब्ध रहती ही हैं क्योकि जब से विज्ञान ने प्रगति की है तब से गर्भपात करवाना आसन और अधिक भी होने लगे हैं |

ये सब बातें अठारवीं सदी की नहीं बल्कि अपनी इक्कसवीं सदी की हैं |जहाँ हम खुद को हाईटेक और मोर्डन बतातें हैं पर वहीँ बेटी के जन्म होने पर खुद को एक दम से गंवार घोषित करने से भी नहीं रुकते |आज के वक़्त में माँ की कोख ही अपनी बेटी के लिए कब्रिस्तान बन चुकी है और किसी भी घर में हो रहे भूर्ण-हत्या के लिए उस घर की महिलाओं की भागीदारी सबसे अधिक रहती है |

झारखंड, बिहार और छत्तीसगढ़ जैसे पिछड़े राज्यों में भूर्ण-हत्या के आंकड़े कम है जितने की अपने हरियाणा में सामने आते हैं | धन-धान्य, आर्थिक संपदा से परिपूर्ण फिर भी बेटियाँ सबको बोझ लगती रही हैं, ये बात हम सबके लिए चिंताजनक है।
प्रदेश की हकीकत जानकर आप चौंक जाएंगे, लेकिन सच है, भयावह है। महेंद्रगढ़, रेवाड़ी, झज्जर, भिवानी, सोनीपत, गुड़गांव, रोहतक, पलवल, फतेहाबाद, कैथल आदि ऐसे जिले हैं, जहां सैकड़ों गांवों में वर्ष 2014 में एक भी बेटी ने जन्म ही नहीं लिया है या उन्हें जन्म लेने ही नहीं दिया गया|

देश में सबसे कम बाल लिंगानुपात वाले महेंद्रगढ़ जिले की नारनौल तहसील का गांव चिंडालिया तो एक बानगी है, जिले के 60 गांव, फतेहाबाद के 63 और करनाल के सात गांव ऐसे हैं, जहाँ पिछले एक साल में एक भी बेटी नहीं जन्मी। इसी प्रकार रोहतक जिले के शिमली में वर्ष 2014 का बाल लिंगानुपात 400 और नौनंद का 450 रहा।

पिछले लंबे समय से इन जिलों में लिंगानुपात में बड़ा अंतर आया है जिससे बेटियों की कमी समाज के लिए चिंता बन गई है। हरियाणा के बारह जिलों में लिंगानुपात की स्थिति खराब है। वहीं सबसे बड़ा सवाल है कि क्या मोदी जी के इस अभियान से लोगों की सोच में बदलाव आएगा? क्या हरियाणा में लड़कियों को बराबरा का दर्जा मिलेगा, क्या मोदी जी का अभियान सफल होगा ?
देश के इतिहास में पहली बार ऐसा हुआ है कि किसी मंच पर देश के प्रधानमंत्री ”बेटी बचाओ,बेटी पढाओ” का नारा लेकर खुद आगे आये है |”बेटी बचाओ,बेटी पढ़ाओ’ अभियान का आगाज तो हो चुका है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने हरियाणा को इसलिए चुना कि देशभर में बाल लिंगानुपात के सबसे खाराब हालात यहीं है। वहीं दूसरी ओर हरियाणा के मुख्यमंत्री मनोहर लाल खट्टर जी ने भी कहा कि राज्य में कन्यादान और लाडली योजना का लाभ अब परिवार की सभी बेटियों को दिया जाएगा। पहले ये लाभ परिवार की 2 बेटियों तक ही मिलता था जिसका विस्तार कर अब इसे सभी बेटियों के लिए लागू किया गया है।

पीएम ने कहा, ‘यदि देश में 1000 लड़कों का जन्म होता है तब 1000 बेटियों का भी जन्म होना चाहिए। ऐसा नहीं होता है तो कोई भविष्य नहीं है। यदि 1000 बेटे जन्म ले रहे हैं और बेटियां 850 ही तो इसका मतलब यह हुआ कि 150 लड़के कुंवारे रह जाएंगे।यूनाइटेड नेशन ऑफिस ओन ड्रग्स एंड क्राइम की 2013 की सर्वे से यह पता चलता हैं कि हरियाणा के अधिकांश जिलों में रिसर्च रिपोर्ट बताती है की हरियाणा में सबसे ज्यादा औरतो की खरीद-फरोत में बढ़ोतरी हो रही है |, बाहर से शादी के लिए खरीद कर लाई गई औरतों (शादी के लिए ) को यहाँ पारो के नाम से पुकारा जाता है। आज यही स्थिति हरियाणा के अधिकांश जिलों की है की शादी की उम्र में भी लड़कों की शादी नहीं हो पा रही और इसका मुख्य कारण घटता लिंगानुपात है।’हरियाणा में तभी तो लड़कियों की बाहर से खरीद कर शादी के लिए तैयार किया जाता है |१५०००-१५००० / में बिहारी और नेपाली लड़कियों को खरीद कर हरियाणवी लड़के शादी कर रहे हैं और इस पूरे प्राकरण में पूरे के पूरे परिवार शामिल होते हैं |
स्थिति सच में चिंताजनक है तभी देश में बलात्कार (रेप) केस बढ़ रहे हैं |लड़कियां कहीं भी सुरक्षित नहीं हैं |दिल्ली के एक ताज़ा सर्वे में ये सामने निकल कर आया है कि दिल्ली में कामकाजी महिलाओं में ३०% तक की गिरावट देखी गई है |दामिनी के किस्से से पहले जहाँ अच्छे घरों की लडकियाँ और महिलाएँ नौकरी के लिए आराम से घर से निकलती थी, अब उस में कमी देखी जा रही है |लडकियाँ पढाई पूरी करने के बाद अपने ही घर से या इंटरनेट के काम को ज्यादा अहमियत दे रही हैं |
कन्या भ्रूण हत्या के अगर कारणों पर ध्यान दिया जाय तो दो तथ्य सामने आते हैं, पहला जागरूकता की कमी तो दूसरा दहेज़ प्रथा का बढ़ता चलन. अगर दहेज़ प्रथा पर ध्यान दिया जाए तो यह एक ऐसा अभिशाप हैं जो पंजाब, हरियाणा, उत्तर प्रदेश व बिहार को अपने आग़ोश में जकड़ रखा हैं |एक सर्वे कें अनुसार इन सभी राज्यों में और हरियाणा के ही यमुना नगर में सबसे ज्यादा औरतों के साथ बारदातें और घटनाएँ सामने आती हैं | आज भी औसतन तीन लाख रुपये दहेज़ के रूप में लड़की वालों से लिया जाता है, जो कन्या भ्रूण हत्या का मूल कारण साबित हो रहा है. इतना ही नहीं रूढ़िवादिता भी इसका एक कारण है, जैसे लड़के व लड़कियों में भेद |ओर वही दूसरी ओर हरियाणा की लड़कियां बहादुरी और हौंसले से अपना मुकाम पाने में लगी हुई है |कल्पना चावला,हरियाणा की सर्वश्रेष्ठ महिला बाक्सर मनीषा ,कांता दोहन और अनीता गुड्डू जी हरियाणा की दो बेटियां जिन्हों माउंटएवरेस्ट पर चढ़ने का गौरव पाया |इस बात ये ये तो साफ़ हो जाता है है कि अगर बेटियों को मौका दिया जाये तो वो ..सब काम करके दिखा सकती हैं जो घर का बेटा करता है |
आज भी कुछ लोगों का मानना हैं कि लड़का बुढ़ापे का सहारा होता है लेकिन एक रिपोर्ट के अनुसार पिछले 50 सालों में सबसे ज्यादा वृद्धाश्रम भारत में ही खुलें हैं. आज अगर सभी बेटें “श्रवण कुमार” होते तो सुखी बेटों के रहते हुए दुखी मां – बाप की संख्याओं में इतनी तेज़ी से वृद्धि नहीं होती |जबकि एक नारी अपने सभी रूपों–पत्नी,माँ,बहन,पुत्री में अपने गुणों से एक ख़ास पहचान बना चुकी है फिर भी कितनी बड़ी त्रासदी है कि वो अपनी ही हत्या का बोझ उठाए जीने को मजबूर है |
(साभार दैनिक जागरण और पंजाब केसरी रिपोर्ट्स)

Anju Choudhary

प्रकाशित काव्य संग्रह: …’’क्षितिजा’’ ‘’ऐ री सखी’’ ‘’ठहरा हुआ समय’’ संपादन: १. “कस्तूरी” “अरुणिमा” ‘’पगडंडियाँ’’ ‘’गुलमोहर’’ ‘’तुहिन और गूँज’’ प्रकाशित साझा काव्य संग्रह में मेरी भी कविताएँ…….अनुगूँज, शब्दों की चहलकदमी,नारी विमर्श के अर्थ,सुनो समय जो कहता है,काव्य सुगंध, आकाश अपना अपना (सभी साँझा कविता संग्रह ) मुट्ठी भर अक्षर (साँझा कहानी संग्रह )…समाचार पत्र और पत्रिकाओं से जुडाव: