चैट बॉक्स

रविवारीय कहानी भाग 11 और 12IMG_0586

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भाग 11

मेरी जुबां मेरे तालू से चिपक गयी…मैं यूँ ही मोबाईल को पकडे हुए खड़ी रही और वो दूसरी तरफ से ‘हेल्लो…हेल्लो ‘ करता रहा |ऐसे लग रहा था जैसे किसी ने मुझे चोरी करते हुए रंगे हाथों पकड़ लिया हो |
कुछ दिन ऐसे ही परेशानी में बीत गए, पर एक दिन वो ज्योतिषी अपनी बीबी के बिना मेरे बुटिक पर आ गया |वो मुझ से ऐसे हक से बाते कर रहा था जैसे मेरी पूरी जिंदगी उसने खुद अपने सामने देखी हुई है |उसकी ज्योतिषी में पकड़ थी ये मैं देख चुकी थी क्योंकि उसने मेरे अतीत का एक एक पन्ना मेरे सामने ही खोल के रख दिया था….ये सच था या उसकी खोज….उस वक़्त मैं कुछ समझ नहीं पा रही थी पर उस वक़्त मैं उस से प्रभावित बहुत थी | उम्र में मुझ से छोटा था इसी वजह से कभी उसकी नियत पर मुझे शक नहीं हुआ |
कोई एक महीने के बाद उसका मेरे बुटिक पर आना लगातार बढ़ता गया…कभी अपनी बीबी के साथ तो कभी अपनी छ: साल की बेटी के साथ वो मेरे बुटिक पर आ ही जाता था और बहुत देर तक वहीं,मेरे आस-पास बना रहता था….कुल मिला कर उसने अपने आप को मेरा हमदर्द साबित कर ही दिया |
एक दिन अपनी माहवारी के चलते पेट में उठे दर्द को लेकर मैं बहुत परेशान थी …बुटिक बंद होने का वक़्त था और मेरा घर वहाँ से दूर था |पर मेरी इतनी हिम्मत नहीं हुई कि मैं अकेली घर जा सकूँ |तभी वो एस्ट्रोलजेर आ गया…मेरा उड़ा रंग देख कर वो इतना तो समझ गया कि आज मेरी तबियत ठीक नहीं है…उस ने मेरे से पूछे बिना एक लेडी डॉ को फोन करके वहीँ बुटिक पर बुला लिया और खुद भी तब तक वहाँ रहा जब तक मैंने उसे खुद के ठीक होने की तसल्ली नहीं दे दी |

उस दिन के बाद से वो कभी भी बेरोक-टोक मुझ से मिलने चला आता था…अब बुटिक वाले इम्प्लॉय भी उसे जानने लगे थे |पर उनकी आँखों में एक शक मुझे हमेशा नज़र आ जाता था.फिर भी मैं उस शक को अनदेखा कर देती थी….और ये ही मेरी सबसे बड़ी भूल साबित हुई |
ऐसे ही एक शाम जाती हुई सर्दी की थी …उस दिन बादलों की वजह से दिन जल्दी ढल गया और मैं बुटिक पर अकेली थी…उस दिन उसका आना और अपने घर चलने के लिए जिद्द करना पहले तो मेरी समझ में नहीं आया पर उसकी जिद्द के आगे मुझे झुकना पड़ा ….वो उसकी जिद्द थी या मेरा बचपना या उसका मेरी आँखों में देख कर हिप्नोटाइज़ करना था,मैं सही तरीके आज भी इसे नहीं समझ पाई हूँ वंदु|
मैं एक गुलाम की भांति उसके पीछे उसके घर चली गयी….कुछ देर की बातचीत के बाद उसने मुझे छूना और चूमना शुरू कर दिया…पर मैं उसका विरोद्ध नहीं कर सकी….हिम्मत नहीं थी या मुझे एक साल पहले अपनी मर्ज़ी और प्यार में किया गया सम्भोग याद आ गया, मैं सच में नहीं जानती हूँ वंदु ….पर उस रात भी हम दोनों में सम्बन्ध बने थे…पर मैं दिल से खुश नहीं थी |मैंने विरोध की कोशिश की,पर मेरी आवाज़ घुट गई…मैंने उसे अपने ऊपर से धकेलना चाहती थी पर मेरे हाथों की ताकत को जैसे लकवा मार गया था….पता नहीं क्यों उसके साथ होते ही मुझे ऐसा लग रहा था जैसे आज मेरा रेप हो रहा था…मैं उसके खिलाफ एक भी विरोध की एक आवाज़ नहीं निकल पाई और मुझे खुद के छले जाने का आभास हुआ |

वंदु कब क्या हो जाये कुछ पता नहीं रहता …जिसे आप अपना दोस्त मानते है कब वो आपको लूटने की सोच लेता है ये हम जैसी बेवकूफ औरतें समझ ही नहीं पाती हैं, अपनी मर्ज़ी से आता है और अपनी मर्ज़ी से ही इस जिंदगी को तमाशा बना कर चलता बनता है, पता ही नहीं चलता …ये दुनिया बड़ी क्रूर है बच्चे |

हर कोई कुछ ना कुछ ढूंढ़ रहा है ..हर किसी को यहाँ तलाश है किसी की जो उसके जैसा हो,उसके जैसा सोचता हो,उसकी भावनाओं की कद्र करे….बिन बोले सब कुछ समझ जाए कि उसके दिल में क्या चल रहा है |ज़िन्दगी भर हम किसी के साथ रहते है पर तब भी ये प्रयास कभी सफ़ल होता नज़र नहीं आता, फिर भी हम ऐसा क्यों मान लेते हैं कि बाहर की दुनिया का कोई भी शख्स आकर आपसे जुड़ेगा और एक ऐसा जादू हो जाएगा कि चंद मुलाकातों में वो आपको इतना समझ जाएगा जिस से हम खुद को उसके हवाले कर देंगे या यूँ कहूँ ….हवाले कर देती हैं…..परोस देती है खुद को उसके सामने और वो शख्स हमें झूठा करके…अपनी राह चलता बनता है |

ऐसा क्या जादू होता है इस आकर्षण में कि हम खुद को रोक नहीं सकती हैं और सबसे बड़ी बात जिस इंसान की फितरत ही जगह जगह मुहँ मारने की हो वो किसी एक का कैसे हो कर रह सकता है….और हम उसी इंसान पर सबसे ज्यादा विश्वास करने लगती हैं जो हम से मीठी-मीठी दो-चार बातें कर लेते हैं ये भूल कर कि ये उसका बिछाया हुआ जाल भी हो सकता है |

हर इंसान अपनी अपनी चाहत का अनुभव करता है, यह उसका निजी खजाना होता है,क्योंकि इस बार के अनचाहे सेक्स ने मेरे मन में हर मर्द के लिए नफरत भर दी और दोस्ती के नाम से भी मुझे नफरत हो गई |

भाग 12

उस दिन के बाद से मैंने अपने पांच साल सिर्फ अपने बुटिक हो दिए |और मेरा बुटिक इस शहर का सबसे बड़ा और फेमस बुटिक बना गया और एक दिन अचानक ही तुमने मेरी जिंदगी में एंट्री ली, मेरी गुडिया बन के |बाकि तो अपने घर और बच्चों के बारे में में पहले ही तुम्हें बता ही चुकी हूँ….जिस स्वाति को तुम नहीं जानती थी वो आज तुमने जान ही लिया है…बस ये ही मेरी जिंदगी का सच और राज़ था जो अब राज़ नहीं रहा |

कमरे में एक बार फिर से एक लम्बा मौन पसर चुका था |सर्दियों के दिन थे…पंखे,ए.सी..टीवी कुछ भी नहीं चल रहा था इसी वजह से ठंडी आहें लेने की आवाज़े दोनों ही सुन और समझ सकती थी |इस बार वंदना ने बढ़ कर स्वाति को गले लगाया और कहा ” दी, हम औरतों की जिंदगी एक सी ही क्यों होती है |एक दर्दनाक अंत या घुट-घुट कर सारी उम्र निकल जाती है |”

इस अनोखे माँ-बेटी के रिश्ते में अब दोनों ही रो रही थी…
स्वाति ने एक बार फिर से वंदना के माथे को चुमा | और उस से कहा
”तुम्हे क्या लगा था एक बार रेप होने के बाद तुम्हारे साथ ये क्रम टूट गया या यही विराम लग जायेगा इस जिंदगी को” |

”पता नहीं दी मैंने उस वक़्त ऐसा कुछ सोचा नहीं था ….बस मैं ये जानती थी कि जो हुआ वो सब मेरी मर्ज़ी के बिना हो रहा था ”
वंदना ने अपनी बात को ज़ारी रखते हुए कहा …दी…
सोए हुए को तो कोई भी जगा सकता है,पर अगर कोई सोए होने का नाटक करे तो उसे कोई कैसे जगाए ?पिछले महीने ही नितिन को गए हुए पूरे ३साल हो चुके हैं,उसने एक बार भी पलट कर ये नहीं पूछा कि”तुम कैसी हो वंदना ? कैसी जी रही हो,कैसे कटते है तुम्हारे दिन और तुम्हारी रातें….रातें इस लिए कहा स्वाति दी ‘क्यों कि वही तो काटनी सबसे ज्यादा मुश्किल हैं और नितिन के जाने के बाद उसके दोस्त ने अपनी दोस्ती का पूरा हक अदा किया …उसने मुझे एक रात भी अकेला सोने नहीं दिया |

पहली ही बार के ज़बरदस्ती के सेक्स को वो विडियो,जो गोविंद ने बनाया था, उसकी ही धमकी दे दे कर, मुझे हर रात उसकी बात मनाने के लिए मुझे इतना मजबूर कर दिया जाता था कि उसके चंगुल से निकलने के लिए मेरे पास कोई रस्ता ही नहीं बचता था |

गोविंद की बदौलत एक के बाद एक आदमी मेरी जिंदगी में आता गया और मैं आदमियों के हाथ का खिलौना बन के रह गयी, काली रात के साये में वो मुझे से सारे कुकर्म करवाता रहा |बहुत देसी सी भाषा में वो नितिन के जाने के बाद मेरे जिस्म का दला(दलाल) बन गया है और बिना दारु के किसी के साथ भी अपनी मर्ज़ी के बिना सोना,मरने से भी बदतर होता है दी इसी लिए इन ३ सालों में मुझे दारु और ना जाने किस किस नशे की ऐसी लत लग गई कि अब छोड़े नहीं छूटती |

आपने मुझ से पूछा था ना कि ” गुड़िया शादी को इतने साल हो गए …तुमने बच्चे के बारे में क्यों नहीं सोचा ? तो दी …अब आप ही बताओ कि ऐसे कैसे मैं बच्चे को जन्म दे दूँ ?कौन है जो उसके संभालेगा ?नितिन तो उसे अपना नाम देने से रहा और जिस इंसान ने मुझे इस गंदे रस्ते पर धकेला है उसे मैं अपनी संतान के पिता होने का हक कभी नहीं दे सकती……इसी धंधे के चलते मेरा पूरा परिवार मुझ से दूर हो गया…मैं किसी के आगे सर उठाने के काबिल नहीं रही…..वो इंसान अब क्या किसी को अपना नाम देगा और मैं भी इस गंदे रास्ते पर बहुत आगे निकल चुकी हूँ |

दी…हर रात बदन को नोचने का दर्द और जिंदगी जीने के लिए पैसे की किल्लत सहन नहीं होता दी …वो भी एक इंसान नहीं …३..३ लोग मुझे सारी रात नोंचते हैं |दी.. अब ये दर्द मुझ से सहन नहीं होता |सेक्स की लत और नशे की आदि आपकी ‘गुड़िया’ अपने आप को नहीं बचा सकी |

मेरे विरोध करने के बाद भी मेरी आवाज़ को मेरे ही अंदर मार दिया गया था |

क्रमशः

Anju Choudhary

प्रकाशित काव्य संग्रह: …’’क्षितिजा’’ ‘’ऐ री सखी’’ ‘’ठहरा हुआ समय’’ संपादन: १. “कस्तूरी” “अरुणिमा” ‘’पगडंडियाँ’’ ‘’गुलमोहर’’ ‘’तुहिन और गूँज’’ प्रकाशित साझा काव्य संग्रह में मेरी भी कविताएँ…….अनुगूँज, शब्दों की चहलकदमी,नारी विमर्श के अर्थ,सुनो समय जो कहता है,काव्य सुगंध, आकाश अपना अपना (सभी साँझा कविता संग्रह ) मुट्ठी भर अक्षर (साँझा कहानी संग्रह )…समाचार पत्र और पत्रिकाओं से जुडाव:

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