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पंजाब केसरी…रविवारीय कहानी भाग..10

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तुम्हें पता है, मेरे लिए जिंदगी में हर छोटी से छोटी बात बहुत मायने रखती है |बच्चे मैं बहुत सोचती हूँ रे ! कभी कभी लगता है कि मेरा दिमाग फट जायेगा….हर छोटी से छोटी बात …क्यों…कब …कैसे ….हर सवाल का जवाब चाहिए होता है मुझे तुरंत…नहीं तो दिन-रात बेचैन रहूंगी,वही बात मुझे तेरे में भी दिखाई दी…तेरी बाते सुनते हुए मुझे ऐसा लग रहा था जैसे मैं खुद को सुन रही हूँ वही सब फील कर रही थी जो मैं अपने वक़्त किया करती थी….बस मेरी एक स्थिति तेरे से थोड़ी सी फर्क थी |

अब आगे

”दी ! प्लीज़ मुझे यूँ घूमा कर मत बताओ…ये सब बाते मुझे बेकार की लग रही हैं…आप प्लीज़ पहले मुझे बताओ कि आपके साथ ऐसा क्या हुआ कि वो ज़ख्म आज आपको परेशान कर गए ”|

वंदना के शब्दों के साथ कमरे में एक गहरा सन्नाटा पसर गया

स्वाति ने प्यार से वंदना का हाथ पकड़ कर,प्यार से सहलाते हुए, उसके माथे को चुमते हुए और उसे अपने करीब बैठाते हुए अपनी बात को आगे बढ़ाया ” वंदु, कबीर के व्यवहार से मन इतना बेचैन रहता था, जो ना घर पर लगता था,ना दोस्तों में और ना ही घर से निकलने के बाद किसी भी जगह पर | घर होती तो मन करता बाहर जाऊं और अगर बाहर चली जाती तो मन करता भाग कर घर चली जाऊं| ज़रा सा गुस्सा कब चिडचिडाहट में तब्दील हो जाता था….सारा दिन की कुड-कुड और खुद के सर में दर्द लेकर घूमना आदत बन चुकी थी |
मैं दिन या रात के पंद्रह-पंद्रह मिनट की हवस से तंग आ चुकी थी, उसके लिए मैं,भोगने का सामान बन कर रह गयी थी |
जिस इंसान ने मुझ से शादी की, उसने मुझे कुछ भी मागंने के नाम पर महंगी से महंगी चीज़े परोस दी |महंगे पर्स,साड़ी,सूट,कॉस्मेटिक,चप्पल हर चीज़ ब्रेंडिड |पर जो मुझे चाहिए था,वो साथ रहते हुए भी मुझे ना दे सका और मेरा अकेलापन दिनों-दिन बढ़ता रहा |
और कहीं ना कहीं शायद आगे चल कर मैं भी पैसे को लुटा कर अपने मन के दर्द को शांत करने की कोशिश करती आ रही थी …पर सुकून यहाँ भी नहीं मिला |

तभी मेरे अकेलेपन को मेरे पापा ने समझा और मुझे ये बुटिक खुलवा के दिया |बुटिक के खुलते ही पैसे के साथ साथ मेरा वक़्त भी मेरा होने लगा और जैसे ही वक़्त मेरा हुआ इनका गुस्सा मेरे प्रति ज्यादा बढ़ने लगा क्योंकि अब मेरे पास ओर भी बहुत काम रहते थे इनकी बात सुनने के अतिरिक्त, उसी चिडचिडाहट की वजह से पहले पहले तो ये मुझ पर हाथ उठा देते थे, पर धीरे-धीरे मैंने इनका हाथ उठाने पर, रोकना शुरू कर दिया |जिस दिन इनका हाथ उठना बंद हुआ उसी दिन से मैं भी इनके प्रकोप से आज़ाद हो गयी |

बुटिक की वजह से एक नई दुनिया से मेरा वास्ता पड़ा, ये दुनिया मर्दों की थी |पहले-पहले तो यहाँ बहुत से लोग मिले जो कुछ वक़्त साथ देकर अगल हो गए और कुछ का साथ वक़्त के साथ ओर गहरा होता गया |एक से दोस्ती हुई और वो कब आकर्षण में बदल गयी ये मैं भी नहीं जान पाई | मुझ पर मेरे बच्चों और घर की जिम्मेवारी थी ये मुझे पता था पर पति के व्यवहार से में दुखी थी शायद ये ही बात उस दोस्त ने भांप ली थी या मेरी ही कमजोरियों ने उसे बता दिया था |

आकर्षण कब बिस्तर तक पहुँच गया ये मैं भी नहीं जान पाई, उस दोस्त के साथ हमबिस्तर हुई, सहवास के नाम से कोसों दूर भागने वाली ”मैं” ना जाने कैसे उसके आगे समर्पण कर बैठी |मैंने उसे दिल की गहराईयों से प्यार किया था…पहले पहले तो उसने मुझे इतना प्यार दिया जिसकी कल्पना मैंने अपने जीवन में तो नहीं की थी…लगातार पांच घंटे के सम्भोग ने मुझे नई जिंदगी से रूबरू करवाया | मैं अब भी उसे प्यार करती हूँ भले ही उस इंसान ने मुझे, मेरे पति की तरह ही इस्तेमाल किया, दो साल के सम्बन्ध के बाद एक दिन वो अचानक ही मुझ से ये कह कर अलग हो गया कि ‘मन से अभी भी अकेला हूँ…अज्ञातवास पे जा रहा हूँ अगर वापिस आया तो तुम्हारे ही पास आऊँगा ‘’
और वो आज तक अपने अज्ञातवास से वापिस नहीं आया |

पहले पहले तो मैंने लगातार उस से बात करने की कोशिश करती रही,पर नाकाम रही…कुछ ही महीनों के बाद उसके ही मोबाईल से मुझे उसकी पत्नी या पता नहीं वो औरत कौन थी …की तरफ से धमकी वाले कॉल आने लगे…मैं बेकसूर होते हुए भी कसूरवार बन गई….पर कहीं बहुत पहले से मैं अपनी ही नज़रों में तो कसूरवार तो बन ही चुकी थी |

उस से अलग हुए मुझे एक साल से भी ज्यादा हो चुका था |मैंने मुड़ कर कभी उस से सम्पर्क नहीं किया और ना ही उसने चले जाने के बाद कभी मुझ से मेरा हालचाल लिया |उसके जाने एक ठीक एक साल के बाद एक ज्योतिषी (astroleger) से दोस्ती हुई..वो मेरे बुटिक पर अपनी बीबी के साथ रेगुलर आता था..उम्र में मुझे से छोटा था |
शायद एक दिन मेरे काउन्टर पर किसी पेपर से उसने मेरी बर्थ-डेट देख ली थी तो वही खड़े खड़े उसने बातों में मेरा जन्म का वक़्त भी पूछ लिया और मैंने बता भी दिया तो उसने उन्हीं पांच मिनटों में मुझे मेरे बारे में कुछ बातें बता दी और वो ठीक भी थी |बस ऐसे ही हमारी बातचीत की शुरुआत हुई |
उसके बाद उसके लगातार फोन आने लगे, वो sms पर मुझ से बात करने लगा |मैं भी खाली वक़्त में उस से बातें करने लगी….वो मेरे बारे में जो बताता वो सही ही होता था | ऐसे ही एक दिन अचानक उस ने मुझ से कहा कि ‘आपको अभी एक साल पहले ही किसी ने धोखा दिया है |’
मैं नहीं जानती कि उसे ये सब कैसे पता चला पर उस वक़्त मुझे ऐसा लगा कि जैसे मेरी समझ,मुझे ही लकवा मार गई है |

क्रमशः

Anju Choudhary

प्रकाशित काव्य संग्रह: …’’क्षितिजा’’ ‘’ऐ री सखी’’ ‘’ठहरा हुआ समय’’ संपादन: १. “कस्तूरी” “अरुणिमा” ‘’पगडंडियाँ’’ ‘’गुलमोहर’’ ‘’तुहिन और गूँज’’ प्रकाशित साझा काव्य संग्रह में मेरी भी कविताएँ…….अनुगूँज, शब्दों की चहलकदमी,नारी विमर्श के अर्थ,सुनो समय जो कहता है,काव्य सुगंध, आकाश अपना अपना (सभी साँझा कविता संग्रह ) मुट्ठी भर अक्षर (साँझा कहानी संग्रह )…समाचार पत्र और पत्रिकाओं से जुडाव:

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