चेट बॉक्स

पंजाब केसरी ..रविवारीय कहानी भाग 9

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नितिन के जाने के बाद मैंने बहुत सोचा…बहुत वक़्त दिया अपने आप को कि खुद को संभाल लूँ …आगे की जिंदगी के बारे में सोचूँ | अपनी कड़वी यादों को भुला कर मैं आगे बढ़ूँ पर मेरी किस्मत ने यहाँ भी साथ नहीं दिया |
हमेशा सोचती थी कि क्या विश्वास की वो भीनी सी लकीरी हम दोनों के मध्य कभी नहीं थी ?

अब आगे ….

क्या नितिन ने शुरू से ही मुझे सिर्फ यूज़ किया था…तभी हमेशा उस से प्यार के साथ साथ परायापन भी महसूस होता था | क्यों वो मुझ से ये नहीं कह सका कि हर सुख दुःख बाँटना ही हम दोनों के जीवन का धय है और वही इंसान मुझे इस तरह किसी के हवाले कितनी आसानी से सौंप कर भाग गया …एक भगौड़े की तरह…छीईईईइ !

वंदना ने एक बार फिर से रोते हुए स्वाति की गोद में सर रख दिया ताकि उसका दर्द थोडा सा कम हो सके ….उसके अन्दर इतना कुछ दबा हुआ था कि जिसके चलते वो अपने लिए जीना भूल चुकी थी ओर स्वाति छिप कर अपनी आँखें पौंछ रही थी |कभी कभी अपने दर्द को सुनाने वाला, सुनने वाले के दर्द को नहीं जान पाता,ऐसा भी कुछ नहीं था…दर्द दोनों तरफ बराबर ही था क्योंकि वैसा ही दर्द स्वाति महसूस कर रही थी,अपनी गुड़िया के लिए |

तभी स्वाति भरे गले से अपनी कामवाली बाई को आवाज़ देती है ”शल्लों आंटी !ज़रा दो कप चाय दे जाओ |बहुत तलब लगी हुई है |”…..
और कहीं अंदर से आवाज़ आई ”अभी लाई बिटिया !हम तो कब से राह तक रहे थे आपके आडर का |आप ही देर से बोली है …आपकी चाय का बखत तो कब से हो गया है |”

”ये तो गंदगी का एक ट्रेलर था तुम्हारे सामने…..मैं भी तुम्हारी बातें सुनते हुए कुछ ऐसा ही सोच रही थी |पता है क्यों….क्यों कि हर इंसान को वही मिलता है जैसे उसके साथ अतीत में बीत चुका होता है….बस तभी तो मैं तुमसे बात करने के बाद बरबस ही तुम्हारी ओर खिंचती चली जाती थी….मुझे शुरू से ही लगता था कि तुम्हारे साथ सब कुछ नार्मल नहीं है….तुम मेरे से तो बात करती थी पर वैसे नहीं जैसे एक नार्मल इंसान करता है |

तुम्हें तुम्हारे पति ने धोखा दिया और मेरी कहानी भी मेरे पति की वजह से बनी, नहीं तो मैं अपनी जिंदगी में अपने बच्चों और बाकि घरवालों के साथ बहुत खुश थी |मुझे देखो ….मैंने तो अपनी मर्ज़ी से ये रास्ता चुना था ….जानती हो वंदु ….शरीर का जरुरत से ज्यादा इस्तेमाल और बिलकुल भी इस्तेमाल ना होना दोनों ही सूरत में आप का मन भटकता है और मेरे साथ भी वही हुआ था |

मेरे हसबैंड दिन रात सिर्फ मुझ से मेरा शारीर मांगता था, जिसे इस्तेमाल के बाद उसे मुझ से कोई वास्ता ही नहीं रहता था जैसे मैंने कोई खिलौना हूँ, खेला और मन भर जाने पर घर के कोने में रख दिया अगले इस्तेमाल के लिए|
मैं टूटती रही,बिखरती रही,उसके साथ की एक एक पल की भीख मांगती रही,उसके एक पल के साथ के लिए तरसती रही,पर उसने मेरी परवाह कभी नहीं की,उसे बस मेरे शरीर से मतलब होता था वो उसे इस्तेमाल करता और उसके बाद तब तक शांत रहता जब तक वो अगली बार के लिए खुद को तैयार न कर ले….घंटों मैं मरती रहती,वो जैसा चाहता मुझे वैसा ही करना होता था, उसकी मर्ज़ी के खिलाफ जाने पर अलग से चोटों के निशान पड़ने लगते थे |

मेरे शरीर के सम्मोहन में वो बार बार मुझे नोंचता था |सब कुछ मशीनी रहता था…स्वचालित सा,वही दोहराव….तंग आ चुकी थी मैं अपनी ऐसी लाइफ से जिस में मुझे कुछ बोलने की आज़ादी नहीं थी |वंदु मर्द बहुत अजीब प्राणी होता है…वो अपनी बीबी को मार सकता है,चिल्ला सकता है और धमकी भी दे सकता है पर वही मर्द किसी दूसरी औरत के सामने वो चाहे माँ हो,बहन हो या उसकी गर्ल फ्रेंड उसके सामने बोलने से भी डरता है |

मेरे मन की शांति ने मुझे भी भटका दिया था | जिस वक़्त मैंने घर से कदम बाहर निकाले तब ये नहीं जानती थी कि किसी के लिए भी ”मन” जैसी कोई चीज़ है ही नहीं इस दुनिया में कुछ वक़्त के लिए एक बाढ़ आई थी मेरे भी जीवन में |

मैंने एक ऐसे इंसान की खोजने में निकली थी जो मुझे मेरे मन का सुकून लौटा सके …..पर ऐसा कुछ नहीं हुआ…और मैं वासना की अंधी गलियों में कुछ वक़्त के लिए भटक गयी थी |”

वंदना स्वाति की बात सुन कर एक पल के लिए ऐसे चौंकी जैसे उसे बिजली का जोर का झटका लगा हो और अपनी आवाज़ पर काबू रखते हुए बहुत मुश्किल से सिर्फ इतना ही बोल पाई ”क्या दी आप भी …….”?

वंदना की बात सुनने के बाद स्वाति ने अपनी बात जारी रखी और बोली ”नहीं रे! मेरे साथ रेप नहीं हुआ था, मैं अपनी मर्ज़ी से अपनी मर्यादा लांघ गयी थी |जिसे मैंने प्यार समझा पर उसका अंत वासना के खेल पर ही हुआ |उसके लिए भी मैं एक जिस्म ही रही…बिना भावनाओं के |

तुम्हें पता है, मेरे लिए जिंदगी में हर छोटी से छोटी बात बहुत मायने रखती है |बच्चे मैं बहुत सोचती हूँ रे ! कभी कभी लगता है कि मेरा दिमाग फट जायेगा….हर छोटी से छोटी बात …क्यों…कब …कैसे ….हर सवाल का जवाब चाहिए होता है मुझे तुरंत…नहीं तो दिन-रात बेचैन रहूंगी,वही बात मुझे तेरे में भी दिखाई दी…तेरी बाते सुनते हुए मुझे ऐसा लग रहा था जैसे मैं खुद को सुन रही हूँ वही सब फील कर रही थी जो मैं अपने वक़्त किया करती थी….बस मेरी एक स्थिति तेरे से थोड़ी सी फर्क थी |

क्रमशः

Anju Choudhary

प्रकाशित काव्य संग्रह: …’’क्षितिजा’’ ‘’ऐ री सखी’’ ‘’ठहरा हुआ समय’’ संपादन: १. “कस्तूरी” “अरुणिमा” ‘’पगडंडियाँ’’ ‘’गुलमोहर’’ ‘’तुहिन और गूँज’’ प्रकाशित साझा काव्य संग्रह में मेरी भी कविताएँ…….अनुगूँज, शब्दों की चहलकदमी,नारी विमर्श के अर्थ,सुनो समय जो कहता है,काव्य सुगंध, आकाश अपना अपना (सभी साँझा कविता संग्रह ) मुट्ठी भर अक्षर (साँझा कहानी संग्रह )…समाचार पत्र और पत्रिकाओं से जुडाव:

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