चेट बॉक्स

पंजाब केसरी..रविवारीय कहानी…भाग 7 और 8

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इतनी बात करते ही वंदना स्वाति की गोद में सर रख कर रो पड़ी ….और स्वाति उसके बालों को सहलाती प्यार से उसे अपने ओर करीब करते हुए कहती है कि ” आज रो लो गुड़िया, अपनी दी की गोद में सब आँसू यही निकल जाने दो,ईश्वर से दुआ करती हूँ कि आज के बाद से तुम्हें कोई दुख ना हो|”

गंताक से आगे …भाग 7

कुछ देर के बात वंदना फिर से बोली ;
ये जिन्दगी इतना दर्द क्यूँ देती है दी, मेरे तन की भूख मुझे इतना परेशान करेगी…. ये मैं नहीं जानती थी |नितिन को बहुत बार डेरेक्ट-इन्डेरेक्ट बार समझाने की कोशिश की पर वो समझ कर भी नासमझ बने रहे |मेरे होंठ,मेरे उभार और मेरा अंग अंग उसके चुंबन के लिए तड़पते थे,वो मुझे अपनी बाहों में भरता जरुर था पर मुझे बच्चों की तरह सुलाने के लिए और मैं औरत होने की शर्म में दिनों दिन मर रही थी कि ये कैसा मर्द है,जिसकी बगल में एक औरत रात भर उस से लिपट कर सोती है और वो यूँ ही ठंडा बना सोया रहता है और मैं पूरी रात अकेली पड़ी अपनी ही वेदना में गीली हो कर छूट जाती थी |मैं अपने ही अंदर, अपनी ही आग से जल रही थी |

दिन तो काम और बीमार आंटी की देखभाल में ही निकल जाता था पर रात मेरे लिए इतनी भारी रहती थी कि मैं चाह कर भी रात की उदासी और वीरानी को आने से रोक नहीं पाती थी….कभी तो पूरी रात कोई किताब/उपन्यास पढने में निकल जाती थी या रातभर जाग कर टीवी देखना और फिर नींद की गोली खा कर सोना…बस ये ही जिंदगी जीने को मजबूर हो चुकी थी क्यों कि हर वक़्त एक ही बात मेरे दिमाग में हर वक़्त घूमती थी कि कब ऐसी कोई रात आएगी जब उसके कांपते हाथों की तपिश मुझे मेरे ही भीतर पिघलने को मजबूर कर देगी, मेरी उखड़ी साँसों में,मेरी देह संगीत का वंदन करेगी और कब उसका प्यार मुझे स्पर्श करता हुआ आहिस्ता-आहिस्ता मेरे अन्दर प्रवेश करेगा और तब मैं उस समर्पण को उम्र भर के लिए अपनी यादों का एक अटूट हिस्सा बना कर जीने को अपना मकसद बनाऊँगी|

मेरी वासना का ज्वार अब सर उठाने लगा था |हल्की सी नींद में भी मुझे प्यार करने और करवाने वाले सपने आने लगे ….सपने में हलके से स्पर्श से भी मैं खुद की आवाजों को अपने ही अन्दर महसूस करती थी और कुछ ही देर में गीली होने के आभास से मेरी नींद खुल जाया करती थी….अपनी इस स्थिति को लेकर मैं बहुत परेशान रहने लगी थी…..और बहुत बार घंटों अपना कमरा बंद करके रोई हूँ दीदी |बार बार मेरी खुद के कोशिश करने पर भी मैं ठुकरा दी गई और उस दिन मैं अपने ही भीतर टूट गई और मुझे खुद के औरत होने और छले जाने का आभास हुआ |

मन में अजीब अजीब से सवाल उठते थे’ क्या करूँ….कहाँ जाऊं…किस से अपने मन की बात कहूँ …कौन समझेगा मुझे …कौन विश्वास करेगा मेरी बात का??? घर छोड़ दूँ ….तो रहूंगी कहाँ ? भाई भाभी को क्या कहूँगी कि क्यों घर छोड़ा ..कहीं सब मेरे ही अन्दर दोष ना निकालने लग जाएँ? हजारों प्रश्न और उसका उत्तर एक भी नहीं |

माँ थी नहीं, भाभी से कुछ भी कहने का मतलब ही नहीं था और आज तक कोई ऐसी दोस्त भी नहीं थी जिस से अपने दिल की हर बात खुल कर शेयर कर लेती |सवालों का मकड़जाल मुझे अपने ही जाल में लपेटे जा रहा था |किसी भी काम को करने से पहले आँखों में आँसू अपने आप ही आ जाते थे |
और एक दिन नितिन का वो छिपा हुआ सच मेरे सामने मुझे ही चिढ़ा रहा था …इत्तेफ़ाक से मुझे अपने हमसफर का जिस्म देखने का अवसर मिला जो मेरे लिए किसी बम ब्लास्ट से कम नहीं था| सब ठीक था पर उसका अपनी पत्नी को संतुष्ट कर पाने वाला अंग, मुझे प्रत्यक्ष रूप मंे नितिन के ना-मर्द होने की सच्चाई बयान कर रहा था कि वो जिस्मानी रूप से अपनी पत्नी को संतुष्ट करने लायक स्थिति मे नहीं था|

गंताक से आगे ..भाग 8

आज नितिन का सच देख कर मैं सन्न रह गई और वो शर्मिंदगी के मारे मेरे से नज़रे नहीं मिला पाए | जिस्म की एक-एक मूर्छित संवेदना धधक उठी कि मेरे साथ शुरू से धोखा हुआ है,प्यार सम्मान, इज्ज़त,पैसा और आपसी रिश्तों को बांधने की ताकत सब की सब धरी रह गई |

नितिन के ऑफिस चले जाने के बाद मैं घंटों रोती रही….अलमारी में रखा अपना हर कीमती सामान उठा कर पागलों की तरह बाहर फेंकना शुरू कर दिया…इसी पागलपन के चलते खुद को मारने की कोशिश भी की पर मार ना सकी ….पता नहीं कौन सा मोह था जिसने मुझे ऐसा करने से रोक लिया|जैसे जैसे दिन सरकता गया वैसे वैसे मैंने पाया की मेरे अन्दर एक अलग ही आग है….एक भूकंप उठ चुका था मेरे जीवन में |उत्तेचना ने पहले ही मेरा बुरा हाल किया हुआ था पर आज कुछ अलग ही महसूस कर रही थी |पर अब मेरे पास सोचने को कुछ था ही नहीं …और सोचती भी तो किसको और किस के लिए ?

और दी …उसी रात नितिन शराब के नशे में जब घर आया तो उसके साथ उसका सबसे अच्छा दोस्त गोविन्द था,गोविन्द पहले भी बहुत बार नितिन के साथ घर आ चुका था, हम तीनों ने मिल कर बहुत बार एक साथ डिनर भी किया था…….पर वो रात मेरे लिए क़यामत की रात थी |नितिन ने कसमें देकर मुझे गोविन्द के साथ सोने को मजबूर किया , पर मेरे मना करने के बाद मुझे मारा-पीटा गया और मुझे पलग से बाँध कर, मुझे ज़बरदस्ती अपने ही सामने गोविन्द के साथ वो सब करने को मजबूर किया जो एक औरत कभी नहीं चाहती |

निवस्त्र, हाथ-पैर बंधने के बाद,नितिन और गोविंद की क्रूरता के आगे मैं हार गई थी दी |नितिन ने मेरा रेप करवाया और गोविंद ने रेप किया ताकि नितिन का मानसिक भ्रम उसके खुद के प्रति बना रहे |पूरी रात नितिन के सामने ही गोविन्द,जंगली जानवर सा मेरे शरीर को रौंदता रहा और मैं नितिन-प्लीज़-नितिन करती रही पर वो मेरे ही सामने बैठा सब चुप-चाप देखता रहा, शराब पर शराब पीता रहा, जैसे उस कमरे में कुछ हो ही नहीं रहा था |

रो रो कर और चीखों से मेरी आवाज़ दब चुकी थी,मेरी आँखों में आँसू थे और शरीर पर गोविंद के जानवरों की तरह काटने के काले और नीले निशान,और साथ साथ नितिन की सिगरेट के निशान उनकी क्रूरता से मेरा पूरा बदन दर्द की छाया में था….निशान मेरे बदन के साथ साथ मेरी आत्मा पर भी थे….जिसे अब उम्र भर नहीं भरा जा सकता था| एक ऐसा दर्द जो जिंदगी भर के लिए मेरा बन गया था |

नितिन के लिए मेरा प्रेम मेरे लिए जीवन भर के लिए बोझ बन गया…..एक ऐसा जख्म जो कभी भी भरने वाला नहीं था पर जिंदगी बढ्ने के साथ साथ वो नासूर बन जाएगा…..मैं ये नहीं जानती थी |
इतना दर्द,इतनी तड़पन के बाद मैं कब बेहोश हो गई मुझे नहीं पता चला,और जब सुबह मेरी आँख खुली तब पूरा कमरा मेरे वजूद की तरह बिखरा हुआ था…शराब और सिगरेट के धुँए के साथ साथ मेरे साथ हुए अन्याय की कहानी खुद ही सुना रहा था |’
वंदना ने नज़र उठा कर देखा तो स्वाति की आँखों के कोने से पानी की एक लकीर बनी हुई अब भी नज़र आ रही थी तभी उसने देखा कि स्वाति ने बढ़ कर उसके माथे को चुमा और अपने गले लगा लिया और भरे गले से सिर्फ इतना ही कहा ‘’ ओह! मेरी गुडिया…कितना दर्द समेटे हुए हो अपने अन्दर….सब खाली कर दो आज अपनी दी के आगे….माँ समझकर सब कुछ कह दो…जो आज तक किसी से नहीं कह पाई हो’’|

वंदना ने अपनी सिसकियों में बात को जारी रखते हुए कहा,,…दीदी….मैंने अपने रेप की बात भाभी से करना चाहती थी…पर नहीं कर पाई…भाई को बताना चाहती थी…पर नहीं बता पाई…मेरे माँ-बाबा नहीं है…ना कोई बहन…भतीजी या भांजी जिसे मैं अपने दिल के ज़ख्म दिखा सकती…मैं अन्दर ही अन्दर टूटती रही,पल पल मरती रही…मेरे चेहरे की हँसीं छिन चुकी थी कि नितिन ने मुझे और मेरे दिल को क्यों नहीं समझा …ऐसे कैसे मुझे किसी के भी हवाले कर दिया |

‘हाँ माना जिंदगी में प्यार के साथ सेक्स बहुत जरुरी है …पर इतना भी जरुरी नहीं कि अपनी इज्ज़त बचाने के लिए उसने मुझे ही तार-तार कर दिया …वो क्यों नहीं समझ सका कि इस तरह के अनजाने सेक्स के बाद मुझे उसकी सबसे ज्यादा जरुरत होगी… और वो अपनी इंडिया की सारी प्रॉपर्टी मेरे नाम लिख कर,मुझे बिना बताए हमेशा के लिए दुबई चला गया |अब क्या करूंगी मैं ऐसे पैसे का जो मेरी इज्ज़त मुझे नहीं लौटा सकता था |क्या करूँ इतनी प्रोपटी का,जो मुझे पहले वाली वंदना नहीं लौटा सकती थी |
क्या करती में इतनी दौलत का,जिसे मेरा होना था वो तो हुआ नहीं और पैसा भी कभी किसी का दोस्त बना ??
नितिन के जाने के बाद मैंने बहुत सोचा…बहुत वक़्त दिया अपने आप को कि खुद को संभाल लूँ …आगे की जिंदगी के बारे में सोचूँ | अपनी कड़वी यादों को भुला कर मैं आगे बढ़ूँ पर मेरी किस्मत ने यहाँ भी साथ नहीं दिया |
हमेशा सोचती थी कि क्या विश्वास की वो भीनी सी लकीरी हम दोनों के मध्य कभी नहीं थी ?

क्रमशः

Anju Choudhary

प्रकाशित काव्य संग्रह: …’’क्षितिजा’’ ‘’ऐ री सखी’’ ‘’ठहरा हुआ समय’’ संपादन: १. “कस्तूरी” “अरुणिमा” ‘’पगडंडियाँ’’ ‘’गुलमोहर’’ ‘’तुहिन और गूँज’’ प्रकाशित साझा काव्य संग्रह में मेरी भी कविताएँ…….अनुगूँज, शब्दों की चहलकदमी,नारी विमर्श के अर्थ,सुनो समय जो कहता है,काव्य सुगंध, आकाश अपना अपना (सभी साँझा कविता संग्रह ) मुट्ठी भर अक्षर (साँझा कहानी संग्रह )…समाचार पत्र और पत्रिकाओं से जुडाव:

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