चेट बॉक्स

मेरे पहले कहानी संग्रह ” मुझे मंज़िलों की तलाश है” से कहानी ‘ चेट बॉक्स ‘ पंजाब केसरी दिल्ली ‘ रविवारीय’ में प्रकाशित होनी शुरू हुई है … इसका पहला भाग 2जुलाई,9 जुलाई, 16 जुलाई, 23 जुलाई,३० जुलाई और अब 6 अगस्त को ये अपने छठे भाग के साथ सब सब के बीच है |

कहानी पूरी होने तक ये क्रमशः के साथ हम सब के बीच आती रहेगी….

गंताक से आगे …. भाग 6

एक ही हफ्ते में एक बड़े से होटल में बहुत शानदार तरीके से मेरी शादी हो गई| शादी का सारा खर्चा नितिन के परिवार ने किया | (अब आगे)…………………………

दी..शादी के एक महीने बाद मुझे जिंदगी ने एक ओर सरप्राइज़ दिया कि मेरी भाभी, जो मुझ से हर वक़्त खफा रहती थी…..अब वो मुझ पर नाराज़ नहीं होती थी |मायके जाने पर (मायके के नाम पर भैया-भाभी ही तो सब कुछ थे)अब वो मुझ से कड़वा नहीं बोलती थी |मैंने ऐसा महसूस किया कि मानों मैंने अपनी जिंदगी की वो अनदेखी जंग जीत ली थी जिसके लिए मैं एक अरसे से तड़प रही थी|भाभी एक दोस्त के रूप में मुझ से जुडने लगी थी |पर ऐसा क्यों हो रहा था, उस वक़्त ये बात मेरे दिमाग में नहीं आ रही थी …..बस मैं खुश थी इतनी खुश की मुझे माँ तो नहीं पर माँ जैसी १०% जरूर मिल गई थी…कम से कम उस घर में मेरे आने-जाने से वो अब अपनी खुशी ज़ाहिर करती थी |

तभी स्वाति ने उसे बीच में ही टोक कर पूछा” तो वन्दु तुमने इस बात को जानने की भी कभी कोशिश नहीं की | जो भाभी कल तक तुम्हारी दुश्मन थी …..तुमसे बात नहीं कर रही थी…. तू उसके लिए बस एक अनचाहा बोझ थी….फिर भी तू खुश थी ??? ये कैसी खुशी थी तेरी बच्चे ?

” हाँ दी! मैंने सच में कुछ भी जानने की कोशिश ही नहीं …..अगर ये भी झूठ था तो भी मैं इसी के सहारे अपनी बाकि की जिंदगी निकाल देना चाहती थी ”|

ना चाहते हुए भी कभी कभी कुछ रिश्ते अपने आप बन जाते है और दी …ऐसा ही रिश्ता मेरा ‘नितिन’ से बन गया | रिश्ता अनदेखा तो नहीं था पर बिना पहचान के जरुर था|

नितिन का तो मुझे पता नहीं पर मैं नितिन के आकर्षण में बंधी किसी चंचल हिरणी की तरह कुलांचे भर रही थी |मैं सुन्दर दिखना चाहती थी …..शादी के बाद पैसे की चमक से मैं लापरवाह हो गई थी….घर पर कोई था ही नहीं जो मुझे बेकार के खर्चे के लिए टोकता |मेरा ज्यादातर टाइम अब ब्यूटीपार्लर जा कर फेशिअल, पेडिक्योर,मेनिक्योर,हेयर स्पा, हेयर कलर ओर ना जाने क्या क्या करवाने में बीतने लगा | मैं बस सुन्दर दिखना चाहती थी…किसी भी कीमत पर |
मैं अपने पहनावे को लेकर पहले से ज्यादा सचते हो चुकी थी ताकि ऐसा कोई भी मौका ना चुके कि नितिन मुझ से दूर हो,ऐसा मैं अपने आप से सोचने लगी थी, जबकि नितिन की ओर से ऐसी कोई भी बात नहीं कही गई थी जिस की वजह से मैं उसे किसी भी शक के दायरे में रखती |
२७ की उम्र में भी मेरी हर हरकत अब मुझे १७-१८ साल की लकड़ी जैसी लगती थी पर मेरी सब शंकाएँ,नितिन को लेकर मेरा लंबा सा इंतज़ार तब खत्म हुआ जब शादी के दो महीने के बाद नितिन ने आकार मेरे आगे अपने प्यार का इज़हार किया था |
दी…उस वक्त मुझे कुछ समझ नहीं आया कि मैं उसे क्या जबाब दूँ | बस मुझे शर्म आ गई और मैंने अपनी नज़रे झुका ली |ये जिंदगी का पहला अवसर था जब किसी ने मुझ से प्यार होने की बात कही थी |”

वंदना ने नज़र घुमा कर स्वाति की ओर देखा तो वो अपनी ठुड़ी पर हाथ टिकाये बहुत ध्यान से उसे ही सुन रही थी …

स्वाति दी….हम औरतों के लिए प्रेम की भाषा का कोई ओर-छोर नहीं…कभी आँखे न्योता देती हैं ,तो कभी मौन स्वीकृति देता है और मन की दीवार पर गड़ी प्रेम की खूंटी से गिरने लगती है तमाम अनकही बातें और तब भीगने लगती है अपनी ही आँखें |मुझे यूं लगा कि नितिन मेरे जीवन में एक बड़ा बदलाव लेके आए है |

नितिन ड्रिंक्स लेते थे ये बात उन्होंने मुझे शादी की पहली ही रात बता दी थी और इसी लिए उन्होंने जिद्द करके…अपनी कसमें देकर…मुझे थोड़ी-थोड़ी वाइन (एल्कोहल)पिलानी शुरू कर दी ….पहले पहले तो मुझे अच्छा नहीं लगता था बहुत मना करने और झिझक के साथ मैंने उनका साथ देना शुरू कर दिया |
ऐसा मेरे साथ पहले कभी नहीं हुआ था …मैं आम से किसी एक लिए बहुत ख़ास बन चुकी थी…ये जाने बिना क्या अच्छा है और क्या बुरा, बस ऐसा कुछ भी करना जो मुझे नितिन के करीब रखे,मैंने वो सब किया जो मुझे नितिन कहते थे |

पर मैं यहाँ भी गलत साबित हुई …..कुछ वक़्त के बाद ऐसा लगा जैसे फिर से जिंदगी की रफ्तार रुक सी गई है | नितिन का प्यार मेरे लिए मौखिक …तो बहुत था पर वो शारीरिक कभी नहीं हो पाया |जब जब मैंने बहुत कोशिश की तब तब नीतिन ने अपने कमरे में ही अपना अलग बिस्तर बिछा लेते और सो जाते और मैं पूरी रात करवटें बदलती रहती |और दी बहुत बार तो वो घर भी नहीं आते थे ….मेरे बार बार पूछने पर बस इतना जरूर कह देते थे कि खेतों पर था ….आज फसल लगानी थी ….आज फसल काटनी थी, आज वहाँ मजदूरों में झड़प हो गई थी,वगैरा-वगैरा, बहाने तो बहुत थे, तभी तो हर बार मुझ से दूर रहने का एक बहाना नितिन के पास हमेशा रेडी रहता था |ओर कारोबार के साथ साथ,नीतिन अपने खेतों का काम भी खुद देखा करते थे…कम से कम मैं इतना जान और समझ रही थी |

आपको पता है दी …शादी की पहली ही रात नितिन ने कमरे में आते ही मुझ से कहा ”वंदना तुम कपड़े बदल लों …तुम थक गई होगी ”| तब मैंने इस बात को बहुत ही नॉर्मल तरीके से लिया था ,हिंदी फिल्मों में देखी गई सुहागरात की तरह मैं भी अपने मन में ना जाने क्या-क्या सपने संजोये बैठी थी, पर हम लोगों की वैसी सुहागरात कभी नहीं हुई |नितिन ने मुझे मन का प्यार बहुत दिया पर हम दोनों के तन एक कभी ना हो सके |

दी…शादी के ५ साल बीत जाने के बाद भी अब भी ऐसा लगता…मानो वह कोई अजनबी हो,मैं जितना नितिन को पकड़ने की कोशिश करती थी वो मुझ से उतना ही दूर छिटक जाते थे |कहते है ना, जब तक प्यार में तपिश नहीं होती वो अपने आप में सम्पूर्ण नहीं होता और वो ही तपिश मेरी जिंदगी से गायब थी….अब मौखिक प्यार भी नीम की तरह कड़वा लगने था |

इतनी बात करते ही वंदना स्वाति की गोद में सर रख कर रो पड़ी ….और स्वाति उसके बालों को सहलाती प्यार से उसे अपने ओर करीब करते हुए कहती है कि ” आज रो लो गुड़िया, अपनी दी की गोद में सब आँसू यही निकल जाने दो,ईश्वर से दुआ करती हूँ कि आज के बाद से तुम्हें कोई दुख ना हो|”

क्रमशः

Anju Choudhary

प्रकाशित काव्य संग्रह: …’’क्षितिजा’’ ‘’ऐ री सखी’’ ‘’ठहरा हुआ समय’’ संपादन: १. “कस्तूरी” “अरुणिमा” ‘’पगडंडियाँ’’ ‘’गुलमोहर’’ ‘’तुहिन और गूँज’’ प्रकाशित साझा काव्य संग्रह में मेरी भी कविताएँ…….अनुगूँज, शब्दों की चहलकदमी,नारी विमर्श के अर्थ,सुनो समय जो कहता है,काव्य सुगंध, आकाश अपना अपना (सभी साँझा कविता संग्रह ) मुट्ठी भर अक्षर (साँझा कहानी संग्रह )…समाचार पत्र और पत्रिकाओं से जुडाव:

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