चेट बॉक्स

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मेरे पहले कहानी संग्रह ” मुझे मंज़िलों की तलाश है” से कहानी ‘ चेट बॉक्स ‘ पंजाब केसरी दिल्ली ‘ रविवारीय’ में प्रकाशित होनी शुरू हुई है … इसका पहला भाग 2जुलाई,9 जुलाई, 16 जुलाई और अब 23 जुलाई को ये अपने चौथे भाग के साथ मेरे तक पहुँची थी |

३० जुलाई को इसका पांचवा भाग आया जो आप सबके साथ अब यहाँ साँझा कर रही हूँ

कहानी पूरी होने तक ये क्रमशः के साथ हम सब के बीच आती रहेगी….


गंताक से आगे …. भाग 5

भाभी मुझे घसीटे हुए मेरे कमरे में ले गई….और तब तक मुझे मारती रही, जब तक उनका गुस्सा शांत नहीं हो गया और मैं भी अपनी ज़िद्द में थी कि मुझे इस लड़के से शादी नहीं करनी …मैं भाभी से तब-तक मार खाती रही, जब तक भाभी शांत नहीं हो गई |ये बात अलग थी कि उनके मारे बहुत से थप्पड़ मुझे ना लग कर कभी पलंग को, तो कभी दीवार पर लग जाते थे |

उनके इतना मारने पर भी मुझे रोना नहीं आया …..एक दम सुन्न और ढीढ़ बनकर उन से मार खाये जा रही थी और बस ये ही सोच रही थी कि हर किसी को उसके हिस्से की आज़ादी मिल गई…पर मेरी जैसी लड़कियों को असली आज़ादी कब मिलेगी ….हमारे लिए आज़ादी का कौन सा दिन आएगा |
पहले तो माँ के पेट में ही मार दिया जाता है और मेरी जैसी जो पैदा हो जाती हैं,उन्हें ये समाज और उनके घरवाले ही जिन्दा मारते रहते हैं….जब तक हम मौत को खुद से गले ना लगा लें|

उस दिन के बाद भाभी के तानों और लड़के दिखाने का सिलसिला आम हो गया था कि लड़के वाले आते, मुझे देखते …भाई-भाभी के सामने अच्छे से बोलते, हूँ-हा हाहा करते, बेशर्मो की तरह खा पी कर चलते बनते|

लगातार ५ सालों तक के सब चलता रहा, भाभी रिश्ते लाती रही और लड़के मुझे नापसंद करते रहे | कभी बडी उम्र का लड़का तो कभी गंजा लड़का और कभी कभी विधुर |मैं हर बार मरती, मार खाती और हर बार अकेले में चीखे मार कर रो कर खुद को हल्का कर लेती थी |पर दी …एक बात यहाँ सही हुई कि भाभी की ज़ुबान जरूर कड़वी थी, मुझे मारा भी बहुत,पर मेरी शादी जबरन किसी से नहीं कारवाई | पता नहीं इस का क्या कारण था |

तभी स्वाति बोली ” वो इस लिया गुड़िया क्यों कि तुम्हारी भाभी तुम से छुटकारा पाना चाहती थी पर वो चाह कर भी तुम्हारी चुप्पी और सादगी से हार जाती थी |और बच्चे तुम इतनी तकलीफ में थी तो कभी तुमने अपनी भाभी के पास बैठ कर बात क्यों नहीं की ? वो भी एक औरत हैं , तुम्हारे दिल की आवाज़ जरूर सुनती ”|

”दी! आप को क्या लगता है ….क्या मैंने कोशिश नहीं की होगी ?
दी बहुत कोशिश की …पर वो हार बार बात शुरू तो करती थी पर जैसे जैसे बात आगे बढ़ती …उनकी ज़ुबान गंदी शुरू हो जाती ….ताने…कभी कभी गाली निकाल देना …ये शुरू शुरू में तो कम था पर धीरे-धीरे बढ़ता गया और कुछ वक़्त के बाद उन्होने मुझ से बात करनी तो क्या ….मेरी शक्ल देखनी भी बंद कर दी |
जिस कमरे में होती….वो वहाँ आती ही नहीं थी ….मेरे रसोई में जाते ही वो अपने कमरे में चल देती | मेरे हाथ का खाना, खाना तक बंद कर दिया था ….चाय के वक़्त आवाज़ लगते थे तो वो मना कर देती थी और थोड़ी ही देर के बाद वो अपने लिए चाय बना अपने कमरे में चली जाती थी |
एक-एक महीने तक हम दोनों में को बात नहीं हुआ करती थी |फिर मैंने ही खुद को समेट लिए |

दी..हमारे धर्मशास्त्रों में भी कहा गया हैं कि ”यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते ,रमन्ते तत्र देवता”….अर्थात नारी को ज्ञान, सम्पति का स्त्रोत माना गया हैं तथा वह देवताओं के सम्मान पूजनीय हैं |मैंने कभी नहीं चाह की भाभी मुझे पूजे या मुझे बहुत-बहुत सम्मान दे |बस मेरी तो छोटी सी ही इच्छा रही है कि बस वो मुझे अपना मान कर अपना ले |

क्यों मेरी भाभी मुझे और मेरे दिल को नहीं समझ पा रही थी कि मुझे सिर्फ और सिर्फ उनके प्यार की जरूरत है ….या मैं ऐसे ही, किसी के साथ खुश नहीं रह सकती, मुझे हर कोई व्यक्ति खुश नहीं रख सकता…मैं सिर्फ उसी के साथ खुश रह सकती हूँ जो मुझे,मेरी भावनाओं को समझे, ना कि मेरे रंग-रूप और सुंदरता को और इसी बात को उन्होनें कभी जानने या समझने की कोशिश ही नहीं की |

जिंदगी तब और कठिन हो जाती है जब आपके अपने आप को समझ कर भी नहीं समझते और फिर भी ना जाने क्यों मैं हर वक्त ऐसा महसूस करती रहती कि भाभी,मेरी माँ बन कर मेरा साथ देने चली आए, पर ऐसा कभी हुआ नहीं |
मैं खुद से क्या चाहती हूँ…कभी समझ नहीं पाई ,मन में एक खालीपन सा क्यों है एक ऐसी कमी, एक ऐसा बचपन जो मैंने जी कर भी कभी नहीं जिया |एक ऐसा प्यार जो मैंने पा कर भी कभी महसूस नहीं किया| किसी को टूट कर प्यार करना क्या होता …वो भाव कैसा होता है जब आप किसी को अपनी प्यार की छावं में लेते है? क्या वो भी मेरे इन भावों को समझ पाएगा ,पता नहीं ?????? मेरी इस अस्थिर जिन्दगी में विचारों की हलचल को आराम कब मिलेगा,मैं नहीं जानती थी ??

स्वाति के मुंह से बरबस ही निकाल पड़ता है ”ओह”| और वो फिर से वंदना को सुनने लगती है |

स्वाति दी………(वन्दु ने अपनी बात जारी रखी ….)
जिन्दगी मे कई बार ऐसे वक़्त आते हैं जब ये सोचना बेहद जरूरी होता है कि जीवन के किस हिस्से को आगे ले जाने की जरूरत है? उसे जो कामयाबी और नकामी का उदाहरण बनेगा या उसे जो कुछ नया गढ़ेगा। ऐसा वक़्त, नये और छूटने वाली अनेकों छवियों के बीच मैं हमको ला कर खड़ा कर देता है| क्या पकड़ा जाये और क्या छोड़ दिया जाये? असल में कुछ नया मिलना और कुछ छूट जाना हमेशा साथ साथ चलता है। कुछ छूट जाने का गम करना इतना महत्वपूर्ण नहीं है जितना की नये की उमंग मे आगे बढ़ना।

शायद इसी बात को सोचते हुए इस बार भाई मेरे लिए रिश्ता लेकर आए |लड़का देखने में अच्छा था और उसके बड़े भैया-भाई, मम्मी-पापा सब दुबई में रहते थे |नितिन ….ये ही नाम था उसका वो अपनी चाची और बाकी के परिवार के साथ यहीं…इंडिया में….राजकोट(गुजरात)में सेटल था ….यहाँ का काम देखता था |बहुत अमीर घर था ….भाई के अनुसार उन्होनें मुझे पसंद ही इस लिए किया था कि फोटो में, मैं उन्हें बहुत सिंपल और घरेलू लगी थी |

मेरे साँवलेपन से भी किसी को कोई दिक्कत नहीं थी….भाई आज रिश्ता पक्का करके ही घर आए थे उनकी ये ही बात मेरे और भाभी के लिए किसी हिरोशिमा बम ब्लास्ट से कम नहीं थी……पर भाभी के लिए ज्यादा | अब उनके भी ना करने का तो कोई मतलब ही नहीं था |

एक ही हफ्ते में एक बड़े से होटल में बहुत शानदार तरीके से मेरी शादी हो गई| शादी का सारा खर्चा नितिन के परिवार ने किया |

क्रमशः

Anju Choudhary

प्रकाशित काव्य संग्रह: …’’क्षितिजा’’ ‘’ऐ री सखी’’ ‘’ठहरा हुआ समय’’ संपादन: १. “कस्तूरी” “अरुणिमा” ‘’पगडंडियाँ’’ ‘’गुलमोहर’’ ‘’तुहिन और गूँज’’ प्रकाशित साझा काव्य संग्रह में मेरी भी कविताएँ…….अनुगूँज, शब्दों की चहलकदमी,नारी विमर्श के अर्थ,सुनो समय जो कहता है,काव्य सुगंध, आकाश अपना अपना (सभी साँझा कविता संग्रह ) मुट्ठी भर अक्षर (साँझा कहानी संग्रह )…समाचार पत्र और पत्रिकाओं से जुडाव: