चेट बॉक्स

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मेरे पहले कहानी संग्रह ” मुझे मंज़िलों की तलाश है” से कहानी ‘ चेट बॉक्स ‘ पंजाब केसरी दिल्ली ‘ रविवारीय’ में प्रकाशित होनी शुरू हुई है … इसका पहला भाग 2जुलाई,9 जुलाई, 16 जुलाई और अब 23 जुलाई को ये अपने चौथे भाग के साथ मेरे तक पहुँची है |

कहानी पूरी होने तक ये क्रमशः के साथ हम सब के बीच आती रहेगी…..आज मैं इसका भाग 4 ,अपने पाठकों के लिए यहाँ पोस्ट कर रही हूँ….

चेट बॉक्स…..(भाग 4 )

जिसने कभी संयुक्त परिवार नहीं देखा वो क्या जाने उसके तौर-तरीके….आँख खोलते ही आज़ादी देखने वाले जंजीरों की कैद को कैसे महसूस करेंगी यार !
दिस्कस्टिंग…पागल है ये सब….लड़की से औरत बनने के बदलाव को कितना गलत परिभाषित करती है |वो बात करती है औरत के शोषण की ये जाने बिना कि वो खुद ही औरतों का शोषण कर रही हैं….किसी एक औरत की मौत की वजह वो है…इस बात से तो वो एक दम अनजान है…..समाज सिर्फ इनके लिखने से नहीं बदलने वाला ये इन्हें समझना होगा वो अपनी ईगो के आगे ये किसी की बात ना तो सुनेंगी और ना ही समझेगी |

छोड़ो रहने दो इन्हें ऐसे ही….अपनी बातों से ये घरों को तोड़ रही है उसकी आंच इन तक भी आएगी, ये लोग अभी इस बात से अनजान है |मुझे तो बस आज अपनी गुडिया को सुनना है….समझना है….’’|इतना कहने के बाद स्वाति ने आगे बढ़ कर वंदना को प्यार से गले लगा लिया |

बस वंदना को तो जैसे मौका मिल गया हो अपनी पूरी बात स्वाति के आगे रखने का मन बना कर ही आई थी…वंदना को अपना दिल खाली करना था और स्वाति को वो सब सुनना था जो अब तक अधूरा था |

वंदना ने कहा ” दीदी आपको अगर मैं, मेरे बारे में कुछ भी चेट में बताती तो शायद आप मुझे गलत समझ लेते.शादी तो बस एक बहाना था,मैं दिल्ली अपनी ज़िद्द और झूठ बोलकर आई हूँ |मुझे पता है कि आपको झूठ बोलना पसंद नहीं है, पर मेरा मकसद आपसे झूठ बोलना नहीं है, मेरा मकसद आपको,अपनी जिंदगी के सच को बताना है |

दी मैं अपनी जिंदगी में अंदर ही अंदर घुट रही हूँ, मैं अपने बारे में किसी के साथ डिटेल से बात करना चाहती थी कि कोई हो जो मेरी सुने,जिसको मैं दिल खोल कर अपनी जिंदगी के बारे में बता सकूँ |दी मैं आपके आगे किस तरह की कोई भूमिका नहीं बाँधूगी |

दी.. मेरी कहानी की शुरुआत उसी दिन से हुई थी जब मैं भैया भाभी के पास रहने चली आई थी | भाई मुझ से १० साल बड़े हैं |ठीक 12th के रिज़ल्ट वाले दिन बाबा के स्कूटर को एक ट्रक ने टक्कर मारी तो माँ-बाबा दोनों ने सड़क पर ही मदद के इंतज़ार में दम तोड़ दिया…..पुलिस केस ना बन जाए इसी वजह से किसी ने उन्हें हॉस्पिटल तक ले जाने की कोशिश भी नहीं की थी |
छोटा शहर और कम साधन ….और वक़्त पर अगर मदद मिल गयी होती तो शायद उन दोनों में से एक तो कोई जिंदा होता |उठाले की रस्म क बाद भाई मुझे अपने साथ राजकोट(गुजरात) ले आया |मैं बारहवीं कर चुकी थी और आगे अभी पढ़ने का मन भी था पर भाभी के डर और उनकी बद-ज़ुबानी की वजह से मैं कभी उनसे ये नहीं कह पाई की मुझे अभी आगे पढ़ना है |

हाँ! एक दो बार मैंने पढ़ने के लिए आवाज़ उठाई तो भाभी ने पूरा घर सर पर उठा लिया…..इतना हो-हल्ला , इतना शोर,खुद को मार देने की धमकी….इस से मैं डर गई और फिर कभी उनके साथ रहते हुए मैंने अपने किसी भी हक के लिए कभी कोई आवाज़ नहीं उठाई | मैंने कभी अपनी माँ के मुंह से एक गुस्से का शब्द नहीं सुना था…..और यहाँ भाभी ने वो सब बोला जो मैंने कभी सुना भी नहीं था |वो गुस्से में कब गालियाँ निकालने लग जाती थी ये उनको भी पता नहीं चलता था और भाई अपने घर की इज्ज़त बनी रहे इसके चलते हमेशा चुप रहते थे कि घर की बात घर में ही दबी रहे |मैं उसी दिन समझ गई कि भाभी के घर में आते ही हमारे घर के दो हिस्से क्यों हो गए थे |

पाँच सालों के दौरान मुझे बहुत सी बुक्स पढ़ने,टीवी देखने और समझने का मौका मिला, भाई मुझे बुक्स लाकर देते,मैं पढ़ती और पढ़ कर उन्हें वापिस कर देती कि कहीं मेरे कमरे में ये सब किताबे देख कर भाई और भाभी के बीच कोई झगड़ा ना हो जाए |ना चाहते हुए भी घर के हर काम की ज़िम्मेदारी मैंने अपने ऊपर ली हुई थी क्यों कि मैं भाभी को ऐसा कोई मौका नहीं देना चाहती थी कि मेरी वजह से उन दोनों में लड़ाई हो जाए |

दी..मेरा भाई बहुत अच्छा है,जानती हो क्यों…क्योंकि उन्हें कभी मुझ में कभी कोई कमी नज़र ही नहीं आती थी जबकि मैं ये अच्छे से जानती थी कि मैं ओर लड़कियों की तरह ना तो खूबसूरत थी ना सुंदर और ना ही मेरा साइज़ 0 था जैसे की करिश्मा और करीना कपूर का था….हम आज की लड़कियों की मॉडल हीरोइन्स…मैं ऐसी भी तो नहीं थी कि ..जिसकी वजह से मैं खुद देख देख कर इतराती रहती |

भाभी की हर सुबह मुझे ये ही कहते हुए होती थी कि इस कोयले की खान से कौन शादी करेगा?भगवान ने इसे ना रंग,ना रूप और ना ही कोई शेप ही देकर नहीं भेजा |हर जगह तो इसका मज़ाक बनता है|बस सारी उम्र ये मेरी छाती पर ही धरी बैठी रहेगी मुझे जलाने के लिए | तो खुद कोयला है ही ,पर इसे देख-देख कर जलती मैं हूँ |’

क्या कहती भाभी को? किस मुहँ से उनसे लड़ती,जबकि मैं जानती थी कि मेरा रंग काला नहीं था,हाँ सावंली और थोड़ी भारी जरुर थी पर बेढंगी कभी नहीं थी | जब भी अपने आप को शीशे में देखती तो इतराना तो दूर कभी देख कर मुस्कुरा भी नहीं सकती थी |

तभी स्वाति ने उसे टोकते हुए कहा ” पर वन्दु !तुम ऐसी भी साँवली नहीं हो कि तुम्हारी भाभी तुम्हें ताने दे |व्यवहारिकता के नाते ही वो तुम से प्यार से भी पेश आ सकती थी”|

”नहीं दी ! आज से पाँच साल पहले में साँवली ही थी | ये देखो मेरी पहले की फोटो |” और वंदना ने अपने पर्स में से कुछ फ़ोटोज़ निकाल कर स्वाति के सामने रख दिये |

स्वाति ने सभी फोटो बहुत ध्यान से देखे और सिर्फ हल्की सी मुस्कान दी |

वंदना ने अपनी बात को ज़ारी रखा ….
पता है दी ! मैं अभी उन्नीस साल की भी नहीं थी कि पता नहीं कहाँ से भाभी मेरे लिए एक रिश्ता ढूंढकर लाई | उन्होंने अपनी तरफ से पूरी तैयारी कर ली थी कि वो मुझे विदा करवा के ही दम लेंगी |पता नहीं वो लड़के वालों को क्या पट्टी पढ़ा कर लाई थी कि उन्होने मुझे देखते ही पसंद कर लिया |पर मैं उस लड़के के लिए हाँ नहीं कर पाई , एक तो मेरी उम्र अभी उन्नीस साल थी और मुझे वो लड़का अपनी उम्र से बहुत बड़ा लग रहा था और दी ….उसके आधे से ज्यादा बाल सफ़ेद थे |मैंने रिश्ते के लिए साफ मना कर दिया |वो दिन मेरे लिए किसी कयामत से कम नहीं था |

क्रमशः

Anju Choudhary

प्रकाशित काव्य संग्रह: …’’क्षितिजा’’ ‘’ऐ री सखी’’ ‘’ठहरा हुआ समय’’ संपादन: १. “कस्तूरी” “अरुणिमा” ‘’पगडंडियाँ’’ ‘’गुलमोहर’’ ‘’तुहिन और गूँज’’ प्रकाशित साझा काव्य संग्रह में मेरी भी कविताएँ…….अनुगूँज, शब्दों की चहलकदमी,नारी विमर्श के अर्थ,सुनो समय जो कहता है,काव्य सुगंध, आकाश अपना अपना (सभी साँझा कविता संग्रह ) मुट्ठी भर अक्षर (साँझा कहानी संग्रह )…समाचार पत्र और पत्रिकाओं से जुडाव:

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