चेट बॉक्स

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मेरे पहले कहानी संग्रह ” मुझे मंज़िलों की तलाश है” से कहानी ‘ चेट बॉक्स ‘ पंजाब केसरी दिल्ली ‘ रविवारीय’ में प्रकाशित होनी शुरू हुई है … इसका पहला भाग २ जुलाई,9 जुलाई और अब 16 जुलाई को ये अपने तीसरे भाग के साथ मेरे तक पहुँची है |

कहानी पूरी होने तक ये क्रमशः के साथ हम सब के बीच आती रहेगी…..आज मैं इसका तीसरा भाग ,अपने पाठकों के लिए यहाँ पोस्ट कर रही हूँ….

चेट बॉक्स…..(भाग ३ )

”हाँ दी ! पर मुझे आपको ऐसे देखना था …एक दम अचानक से और ये जो आपका रिएक्शन था ना मुझे देख कर ….वो मैं कैसे मिस कर सकती थी ”|

”हट धूर्त!तुमने तो मेरी जान ही निकाल दी इन तीन दिनों में |ना कोई फोन, ना कोई मेसज….मेरे पास सिवाए इंतज़ार के ओर था भी क्या करने को, अपना नंबर तक तुमने मुझे नहीं दिया था |जब भी फोन किया, PCO से किया,इतना सस्पेंस क्यों वन्दु”|

”अरे सोर्री ना दी ! वो क्या था कि शादी में आना तो एक बहाना था …..यहाँ मुझे कुछ जरूरी काम भी निपटाने थे…इस लिए आपसे कोई बातचीत नहीं कर पाई ”|

”पर गुड़िया! मेरा बच्चा ….तुझे अच्छे से पता था ना कि तेरी दी इन दिनों तेरा ही इंतज़ार कर रही होगी….फिर भी तूने मुझे परेशान किया ”
स्वाति ने एक नकली नराजगी वंदना को दिखाई तो वंदना माफी मांगती हुई स्वाति के गले फिर से लग गई|…
पर स्वाति को अब भी समझ नहीं आ रहा था कि वो वंदना के लिए इतनी बेचैन क्यों थी?ओर भी दोस्त है उसके , कुछ दोस्तों से मिल भी चुकी है पर इस बच्ची से उसका जुड़ाव अलग ही था….ये बात वो अच्छे से जान रही थी |

चाय-पानी और खाने पीने का दौर चला और उसके खत्म होते ही दोनों आराम से स्वाति के कमरे में जा कर पलंग पर बैठ गई |
दोनों ने भर पेट खाना खाया था और अब बारी हंसी-मज़ाक की थी पर स्वाति बार बार अपनी घड़ी देख रही थी तो वंदना ने मज़ाक में कहा ” क्या बात है दी ….मुझे घर से जल्दी भगाने का प्रोग्राम है क्या ?जो आप बार-बार टाइम देख रहे हो ”|

”नहीं वन्दु! मेरा बस चले तो मैं कभी तुम्हें जाने ही ना दूँ |मैं तो बस इस वक़्त को अपने में समेट लेना चाहती हूँ |”

” और अगर मेरा बस चले ना दी! तो मैं कभी आपको छोड़ कर ही ना जाऊँ “….वंदना ने अपनी ही बात पर एक फीकी और बुझी सी मुस्कान दी | वंदना ने फिर से कहा ” दीदी आप मुझे गुड़िया बुलाते हो ना तो, मुझे अपनी माँ की याद आ जाती है |वो भी मुझे गुड़िया बुलाती थी …अपने पास बैठा कर मेरे बालों में खुद से तेल लगा, मेरी बालों को बहुत तरीके से बांधती थी और आपको पता है दी ….हमारे यहाँ तेल लगे बालों पर आज भी रिब्बन लगाने का रिवाज है और ऐसा करना लड़की के कुवांरी होने की निशानी माना जाता है |”

वंदना ने आगे कहा ” दीदी आप तो कितनी बिज़ी रहती हो, मैंने ऊपर आते हुए देखा नीचे आपने कितना बड़ा बुटीक खोल रखा है, फिर भी आप मेरे लिए कितना वक्त निकाल लेते थे। मुझे अच्छा लगता था,दी! मेरे मम्मी-पापा तो थे नहीं ….भैया- भाभी है फिर भी आपसे बातें करना मुझे हमेशा से ही अच्छा लगता आया है |’’

वंदु ने अपनी बात को थोड़ी देर के लिए रोका तो स्वाति बोल पड़ी ‘’अरे,अरे थोडा आराम से बात करो….मैं कहीं नहीं जा रही हूँ …..और तुम तो जानती हो गुडिया!मेरे दोनों बच्चे बाहर पढ़ते हैं,मेरे पास अपने काम के बाद का वक़्त मेरे दोस्तों के लिए रहता है…इस लिए मेरा वक़्त सही से कट जाए…मैंने फेसबुक ज्वाइन कर लिया….वैसे भी जो भी कस्टमर आता है वो सबसे पहले फेसबुक की ही बात करता है…वैसे मेरे लिए फेसबुक बहुत अच्छा ऑप्शन साबित हुआ है|मैं अपने बुटिक के नए डिज़ाइन वहां अपलोर्ड कर देती हूँ,जिसकी वजह से मेरी सेल ओर भी अच्छी हो जाती है|’’
फेसबुक पर बात चली तो लगे हाथ वंदु ने लगे हाथ एक प्रश्न ओर पूछ लिया….

‘’पर दी… इस जीवन में एक औरत होना ही अपने आप में एक जटिल सवाल है…आप अपने लिए तो कभी अपनी जिंदगी जीते ही नहीं हो …सारी उम्र तो आप, किसी ना किसी के लिए बंधे हुए हो और यहाँ फेसबुक की वाल पे जब देखो तो औरत ही औरत को चालीस साला औरत का ख़िताब दे कर शोषित,गाली देती दिखाई दे जाती हैं….छीईईई…..
मुझे तो ऐसा लगता है जैसे यहाँ एक ऐसी औरतों का गेंग सक्रिय हैं जिसका काम सिर्फ हर किसी की गलती निकालना है दीदी…उन्होंने औरत की कमर के गोलार्ध तो देख लिए ,फैली हुई कमर भी दिख गयी पर उसके पीछे का संघर्ष नहीं देखा…..या वो लोग देखना ही नहीं चाहती कि उनकी कही बात से किसी औरत का घर भी ख़राब हो सकता है | औरत का शोषण पुरुष करें तो समझ आता है क्योंकि वो अपने से आगे किसी को देख ही नहीं सकते पर यहाँ तो औरत ही अपनी स्टेटस से औरतों का शोषण करने पर उतारू हैं,उसकी शारीरिक कमियों को सरे आम उजागर करके पता नहीं वो क्या साबित करना चाहती हैं….
बहुत बुरा लगता है दी…जब एक औरत को अपने आप को साबित करना पड़ता है वो भी अपनी जैसी औरतों के आगे |’’

वंदना की मासूम सी बातें सुन कर स्वाति की आँखें भर आई,उसने वंदना का हाथ खुद के हाथों में पकड़ कर चुम लिया, उसके माथे पर प्यार किया और बोली ‘’वंदु! क्यूँ सोचती हो इतना सब कुछ,यहाँ ऐसी बातें बहुत आम बातें हैं बच्चा |वो हर किसी के दर्द से बेखबर सिर्फ अपनी बात को लिखना और पोस्ट करना जानती है जबकि सब कि सब इस बात से अनजान है कि उनकी लिखी एक ही बात किसी के घर में कितना बड़ा तूफ़ान मचा सकती है|
घर टूट रहे हैं, विश्वास की दीवारें गिर रही है |ये लोग नहीं जानती कि आज घर के मर्द ही अपने घर की औरतों को शक की नज़रों से देखने लगे हैं….और ये औरतों के ऋतुस्राव से लेकर मोनोपोज़ तक की बातें कितने ही आराम से हज़ारों के आगे लिख कर पोस्ट कर देती हैं…ये जाने बिना कि किसी के लिए ऋतुस्राव कितना कष्टदाई हो सकता है….ये कभी महसूस नहीं कर सकती और मोनोपोज़ की स्टेज किसी के लिए कितनी तकलीफ लेके आती है….अनजान है ये मूर्ख औरतें |हर किसी की अपनी सोच है और वो उसे ही सही ठहरती है…औरत कितने संघर्षों के बाद अपनी जगह सबके दिलों में बनाने में कामयाब हो पाती है,ये लोग नहीं जानती |सस्ती प्रशंसा ने इन सबके दिमाग खराब कर दिए है और सब की सब तारीफ़ के सातवें आसमान पर उड़ रही हैं |
क्रमशः …….

सम्पर्कसूत्र … anuradhagugnani40@gmail.com

Anju Choudhary

प्रकाशित काव्य संग्रह: …’’क्षितिजा’’ ‘’ऐ री सखी’’ ‘’ठहरा हुआ समय’’ संपादन: १. “कस्तूरी” “अरुणिमा” ‘’पगडंडियाँ’’ ‘’गुलमोहर’’ ‘’तुहिन और गूँज’’ प्रकाशित साझा काव्य संग्रह में मेरी भी कविताएँ…….अनुगूँज, शब्दों की चहलकदमी,नारी विमर्श के अर्थ,सुनो समय जो कहता है,काव्य सुगंध, आकाश अपना अपना (सभी साँझा कविता संग्रह ) मुट्ठी भर अक्षर (साँझा कहानी संग्रह )…समाचार पत्र और पत्रिकाओं से जुडाव:

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