एक नई शुरुवात

बाँझ, बाँझ, बाँझ ये शब्द सुन सुन का संध्या अब थक चुकी थी |शादी के दस सालों के बाद भी उसके व्यवहार, उसकी सेवाभाव से कोई भी प्रसन्न नहीं था क्यों कि वो इस घर को उनका वारिस नहीं दे सकी थी |अब वो भी अपने इस घर से,यहाँ के लोगों से ऊब चुकी थी जो उसकी मनोदशा को नहीं समझ रहें थे, दिनरात घर के खपना,यहाँ के लोगों को खुश रखना उनके दिनभर के काम करना, उसकी दिनचर्या का हिस्सा था |हर वक्त भाग भाग कर बिना आराम किए वो सबकी इच्छा पूर्ति करती आ रही थी और रात को बंद दरवाज़े के पीछे का सच उसके सिवा कोई नहीं जानता था |और वो कहें भी किस से, कहने के बाद का मज़ाक और तिरस्कार की भागिनी अब वो नहीं बनाना चाहती थी |उसने खुद को उस रब के हवाले छोड़ दिया था, जिस ने उसे इस तरह का जीवन जीने को दिया,हर बार वो ये ही सोचती थी कि अगर वो इतनी भाग्यशाली होती कि सीप की तरह उसकी कोख से कोई मोती जन्म लेता तो ये सौभाग्य उसे कब का मिल चुका होता |एक घट जो उपजता है,जो पैदा होता है, भीतर की ये उमंग उसे कभी नसीब नहीं होगी ये बात उसने अपने आप को बहुत अच्छे से समझा दी थी |आकार के पार की सोच को दर किनारा कर उसने कभी हँसते हुए और कभी रोते हुए अपने समय से समझोता कर लिया था,उसके मन की कशमकश उसे कभी टिक कर घर नहीं बैठने देती थी,कभी मंदिर ,कभी किसी दरगाह पर माथा टेकना कि कोई तो भगवान होगा जो उसकी सुनेगा,उसे किसी भी बाबा के आश्रम ले जाती थी| पर पिछले कुछ वक्त से अपने पड़ोस वाले मंदिर में जाना और वहाँ कथा-प्रवचन सुनना और वहाँ मंडली के साथ कीर्तन करना अब भाने लगा था और उसका खाली वक्त जो कभी घर की कटीली बातों में गुज़रता था अब वो अपने लिए जीने लगी थी| बार बार उसके मन में एक विचार अपना सर उठा कर परेशां करने लगता था कि क्या वो भी अपने लिए एक नई शुरुवात करने की कोशिश करे?क्या वो अपनी मर्यादा, अपनी लीक से हट कर कुछ कदम बढ़ाए अपनी इस जिंदगी के लिए| इसके लिए उसे सबसे पहले अपने संस्कार,मान्यताओं को खुद से बहुत दूर करना था तभी वो एक नई शुरुवात कर सकती थी |
शादी के पंद्रह साल के बाद संध्या गर्भवती है अब ये बात उसके घर वालो के साथ साथ उसकी कीर्तन मंडली को भी पता चल चुकी थी, सब बहुत खुश थे और संध्या इन सब से ज्यादा खुश थी क्यों कि उसी सोच को उसके बरसों के इंतज़ार को अब आकार मिलने वाला था |इस बात को वो अब बहुत अच्छे से जान गई थी संन्यासी और संसारी में इतना फर्क क्यों है ?संसारी अपनी निजी आकांक्षा के लिए ही जीवित है और संन्यासी देने के बाद, कुछ हुआ भी है, सब भूल कर अपनी दुनिया में मस्त रमा रहता है, उसकी भक्ति और उसकी ही चिलम के साथ | पर उसकी इस नई दुनिया के लिए, इस नए परिवर्तन के कौन जिम्मेदार है,ये किसी को सोचने तक की फुर्सत नहीं थी, सबको उसके गर्भवती होने की अधिक खुशी थी कि वो उनका वंश आगे बढ़ा रही थी | लड़का हो या लड़की अब सब कुछ बाते गौण हो चुकी थी, सब बस एक बच्चा चाहते थे ये संध्या के लिए खुशी की बात थी कि वो बंधन मुक्त हो चुकी है| तिरस्कार ओए अवहेलना जीवन से अब दूर हुए है इसी बात को अपने दिमाग में बिठा उसने अपनी जिंदगी का सबसे बड़ा राज़ अपने ही अंदर दफ़न कर दिया था | सत्य के अनेक पहलू हैं और इस सत्य के विपरीत एक सबसे बड़ा सत्य ये था कि सबको बच्चे की चाहत थी, ये बच्चा किसे से है, इस बात से किसी को कोई लेना देना नहीं था, सिवाए सिर्फ एक इंसान के और वो था संध्या का पति,पर वो भी चुप्पी साधे हुए था क्यों कि संध्या के सच से पहले वो खुद का सच जानता था कि वो ही नपुंसक है और ये सब जानते हुए उसकी सोच भी ये ही थी कि अब मैं ही कोई अड़चन ना डालूँ,क्यों कि इतने साल बच्चा ना होने में, मैं ही सबसे बड़ा बाधक था | अब तक की जिंदगी में वो संध्या को घरवालों और समाज के सामने हराता आया था और अब इस वक्त वो जीत कर भी हार चुका था क्यों कि उसके ही सामने संध्या ने अपने माथे से ‘’बाँझ’’ शब्द का बोझ उतार फैंका था,उसने संध्या के सच को उसकी नई जिंदगी और उसकी इस नई शुरुवात को अपने सुर में सुर मिला कर स्वीकार करना ही पड़ा ‘’जो है वो मेरा है और मैं इसका हूँ ‘’||

Anju Choudhary

प्रकाशित काव्य संग्रह: …’’क्षितिजा’’ ‘’ऐ री सखी’’ ‘’ठहरा हुआ समय’’ संपादन: १. “कस्तूरी” “अरुणिमा” ‘’पगडंडियाँ’’ ‘’गुलमोहर’’ ‘’तुहिन और गूँज’’ प्रकाशित साझा काव्य संग्रह में मेरी भी कविताएँ…….अनुगूँज, शब्दों की चहलकदमी,नारी विमर्श के अर्थ,सुनो समय जो कहता है,काव्य सुगंध, आकाश अपना अपना (सभी साँझा कविता संग्रह ) मुट्ठी भर अक्षर (साँझा कहानी संग्रह )…समाचार पत्र और पत्रिकाओं से जुडाव:

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