मै ….और …..तुम

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34 Responses

  1. Rakesh Kumar says:

    मिट गया मुझ में ‘मैं’
    होने का अहसास
    पर ..तुम “तुम” बने रहें …
    पर ..तुम “तुम” बने रहें….

    आपके कवि हृदय से उमड़ी भावों की सरिता दिल पर टक्कर मारती है.
    सुन्दर अनुपम प्रस्तुति के लिए आभार.

    मेरे ब्लॉग पर भी आकर अपने सुविचारों की कुछ छटा बिखेरियेगा.

  2. Sunil Kumar says:

    मिट गया मुझमें में मै ………खूबसूरत अहसास बधाई

  3. Jyoti Mishra says:

    very ardent and vehement expressions !!

  4. मन में चल रहे ताने बाने को आपने बहुत ही सुन्दर ढंग से वस्त्र बनाकर सिल दिया है!

  5. Khare A says:

    bahut hi gehan vichar!

  6. Beautiful as always.
    It is pleasure reading your poems.

  7. वाह ! बेहद खूबसूरत अहसास को संजोया इस प्रस्तुति में आपने …

  8. सच कहा तुम तुम बने रहे और मै , मै ना रही…………।सुन्दर भावाव्यक्ति।

  9. गहरे एहसास के साथ बहुत ही सुन्दर प्रस्तुति

  10. Babli says:

    बहुत सुन्दर भाव और अभिव्यक्ति के साथ लाजवाब रचना लिखा है आपने जो काबिले तारीफ़ है! उम्दा प्रस्तुती!

  11. bahut sundar tareeke se Anu ji aapne dil kee kashak ko lekhni se shabd ke bhaavon me badal diya… umda… aapka mere blog Amritras me swagat hai…

  12. तुम के दंश को गहरे तक झेला है इस इस कविता में … बहुत खूब ..

  13. daanish says:

    जब भी मौक़ा मिला तुम्हें
    नहीं चुके तुम मेरा शरीर
    नोचने से ….

    क्रूर मनुष्यता का मासूम स्त्री के प्रति व्यवहार
    और मन के अजब ताने-बाने को सहेजे हुए
    एक अच्छी कृति निर्मित की है….
    तुम….. तुम बने रहे !!

  14. अनु जी
    वंदना जी के माध्यम से आपके यहाँ आना हुआ और सच कहूँगा व्यर्थ नहीं रहा, आपका फोलोवर बन रहा हूँ तो अब आता रहूंगा आप को पढने!
    आपका भी स्वागत है मेरे ब्लॉग पर, आशा करता हूँ आप आकर अनुग्रहीत करेंगी!
    सुरेन्द्र “मुल्हिद”

  15. mit gaya mujhme “main”…
    par tum “tum” hi bane rahe…:)
    kya kahun….bahut hi dard dikh gaya…sirf main aur tum jaise do sabdo se hi…!!
    tumhari rachna…me alag si pahchaan hai…!!
    lekin kuchh shuru ke shabd janche nahi …unhe kuchh aur tarike se kaha ja sakta tha….
    please anyatha na lena…!!

  16. mukesh mai aage se koshish karugi ki jo thik shabd ho wahi istemaal karu

  17. Dilbag Virk says:

    आपकी पोस्ट आज के चर्चा मंच पर प्रस्तुत की गई है ,.
    कृपया पधारें
    चर्चा मंच

  18. वीना says:

    बेहद खूबसूरत एहसास…

  19. namaskaar !
    behad gahree aur khuli bebaaki se apni apni abhivyakti pradan ki hai , main aur tum se simtte hue magar jitna simte utnaa hi ubhar ke saamane aayi sunder prastuti , badhai .
    saadar

  20. बहुत भावपूण रचना है…एक अनजाने दर्द का अहसास…

  21. आदरणीया अंजु जी
    सादर सस्नेहाभिवादन !

    मन के कोमल भावों की सुंदर प्रस्तुति है –
    तुम पल पल चुकते गए
    मै वक़्त दर वक़्त
    सागर बनती गई


    आपके ब्लॉग पर लगे चित्र भी बहुत ख़ूबसूरत और आपकी कलाप्रियता के परिचायक हैं …

    आपको हृदय सेबधाई और शुभकामनाएं !

    – राजेन्द्र स्वर्णकार

  22. प्रभावी अभिव्यक्ति ……..

  23. किसी ने कहा है–

    जो चीज इकहरी थी वह दोहरी निकली
    सुलझी हुई जो बात थी उलझी निकली
    सीप तोड़ी तो उसमें से मोती निकला
    मोती तोड़ा तो उसमें से सीप निकली।

    आभार

  24. anu says:

    aap sab ka shukriya….meri kavita ko pasand karne ke liye…

  25. आदरणीय अनु जी
    एक गहरा चिंतन प्रस्तुत किया है आपने इस कविता में ..जीवन और अस्तित्व को प्रकट करती रचना हमारे सामने इन दोनों महता को प्रस्तुत करती है ….आपका आभार

  26. वाह! बहुत ही सुन्दर अभिव्यक्ति!

  27. नारी मन को समझने के लिए एक दस्तावेज़ है यह कविता… ‘तुम’ का ‘तुम’ बने रहना स्त्री और पुरुष के बीच मनोवैज्ञानिक अंतर की ओर इशारा कर रहा है.. बेहद शसक्त अभिव्यक्ति…

  28. इस रचना में भावना का वैसा ही समन्वय |
    तुम – तुम ही बने रहे , तुम – तुम ही बने रहे |
    सुन्दर रचना |

  29. anu says:

    kewal ram ji…nilesh ji…arun ji…minakshi ji

    bahut bahut shukriya meri kavita ko pasand karne ke liye

  30. vk says:

    Mai waqt ke santh sagar banti gaai
    bahut gahrai he aap ki baat me bas itna hi kaha ja sakta he ki adbhut adbhut adbhut………

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