सात मोमबतियाँ

एक एक मोमबत्ती
बयान करती है
सही अर्थ
इस जीवन के

टिमटिमाती लौ
संकेत देती है
समय से बंधे जीवन के
पल-प्रतिपल की
उम्मीद के

जीवन
एक जीता-जागता संघर्ष
बांध देता है
दिनचर्या में
जिस में
वस्तुदान,भोजनदान,सदाचार
समयदान,अभयदान
तप और धैर्य
जकड़े रखता है
शपथ की तरह
एक चक्रव्यूह की भांति

इसके सामानांतर
परम्पराओं और नियमों से परे
एक दुनिया
जिसमे है
विद्या ,प्रकाश,बुद्धि,विवेक
ज्ञान, उद्धम और उत्साह
किन्तु अब
अपनी ही पराजय से
क्षीण हो चुकी
जीवन की
ये सात मोमबत्तियाँ
मद्धम हो चली है
अहम के तले !

बुढ़ा कुआँ

तुम संग प्रेम के रस,
खुशबू और उसकी वेदना को
मुझ से अधिक ओर कौन
जान सकता है

सुनो !
तुम्हारा एक पुराना पत्र
मुझे आज मिला
याद है मुझे आज भी
तुम मुझे हर खत
कुएँ के पास बैठ कर लिखा करते थे

जिसमें तुमने लिखा है…..
मुझ संग अपने ख्यालों में
ना जाने तुमने कितनी ही बातें की थी

सुनो…
क्या वो कुआँ आज भी है?
क्या गाँव के बूढ़े दादुओं की,
उनकी ठिठोली,उनके झगड़े-बहस की
आज भी वहाँ चौपाल सजती हैं ?

क्या आज भी गाँव के बच्चे
उसके आस-पास गुल्ली-डंडा,
कन्चे खेलते
और खेत से गन्ने तोड़ कर
चूसते हुए घूमते हैं ?

क्या आज भी
पानी भरने के बहाने
अम्मा,चाची और मौसी
के साथ साथ
गाँव की
नव-यौवनाओं की हँसी गूँजती है?

क्या मसकरो की टोली
अब भी वहाँ से
शोर मचाती हुई निकलती है ?

क्या आज भी वो….शंभू चाचा
सबके बाल वहीं काटते हैं
साईकल पंचर लगाने वाला…सलीम
और चश्मे वाला मोची काका…
अब भी वही बरगद के पेड़ की
छाया में बैठते हैं
क्या आज भी उनकी बहस का मुद्दा
जात-पात और छुआ-छूत
को लेकर है |

हाँ अब तो
बरसों बरस बीत गए
मुझे गाँव छोड़े हुए
और मैं आज भी
तुम्हारे प्रेम को और
अपनी मिट्टी की गंध को
अपने अंदर महसूस करती हूँ |

वक्त के साथ बूढ़े होते हम
अपनी संस्कृति और परम्पराओं की
किलकारी से अब भी भरे हुए हैं
और प्रकाश
कहीं दूर क्षितिज पर
प्राची के लाल होने तक
हमारी आत्मा को
अब भी ढक लेता है |

वक़्त बदला,लोग बदले
परिवर्तन हुआ पूरे समाज का
उसकी सोच का
पता नहीं …
अब भी उस कुएँ के इर्द-गिर्द
वैसी ही महफ़िले सजती भी हैं या नहीं?

ना तुम करीब हो,
ना गाँव करीब है
पर, मैं आज भी
तुम्हारे स्पर्श के अनुभव के साथ
अपनी मान्यताओं को मिलाकर
उसे नित-नवीन करती
चली जाती हूँ और
हर वक़्त बस ये ही सोचती हूँ कि
परम्पराओं की वेदी पर और
एक बूढ़े हो चुके कुएँ की दहलीज़ पर
अब कौन ठहरता होगा ?

Anju Choudhary

प्रकाशित काव्य संग्रह: …’’क्षितिजा’’ ‘’ऐ री सखी’’ ‘’ठहरा हुआ समय’’ संपादन: १. “कस्तूरी” “अरुणिमा” ‘’पगडंडियाँ’’ ‘’गुलमोहर’’ ‘’तुहिन और गूँज’’ प्रकाशित साझा काव्य संग्रह में मेरी भी कविताएँ…….अनुगूँज, शब्दों की चहलकदमी,नारी विमर्श के अर्थ,सुनो समय जो कहता है,काव्य सुगंध, आकाश अपना अपना (सभी साँझा कविता संग्रह ) मुट्ठी भर अक्षर (साँझा कहानी संग्रह )…समाचार पत्र और पत्रिकाओं से जुडाव: