वो…राहें आज भी…..

वो…राहें आज भी है

आज क्यूँ सारा जहान सो गया
दूँ जिसे आवाज़ वो भी
कहीं खो गया
वक़्त कि बंदिशों में
बेबुनियादी इल्जामो में
दिल का हर रिश्ता
धराशाही हो गया
कागज़ पे लिख देने से
रिश्ते भी टूटते है .. ….

लबों की हँसीं
बन कर तितली उड़ चुकी है
वो सुनते नहीं हमारी
फिर भी हम उनके लिए
ही दुआ मांगते है
ना चाहते हुए भी
बिखर चुकी है इच्छाएं सारी
जो ज़माने के सितम है
वो ज़माना जाने
तुने दिए दिल पर
ज़ख्म इतने कि
हम अभी तक उसे ही
सिल रहे है ….

देते रहे वो अपनी
इच्छानुसार इलज़ाम यहाँ
और कबूल करने वाले
आज़ार (दुःख) भी नहीं दे सकते उन्हें

मुजरिम बुतों सी अब भी हूँ ….
तरसती है आँखे नम सी
अपने प्यार के दीदार के लिए
माना है हमने कि
गुज़र गए कारवां
अपनी मंजिल के लिए
पर तेरे इंतज़ार में
वो ..राहें आज भी है
वो…राहें आज भी है
(अंजु….(अनु)))


इस कविता को दो दिन पहले पोस्ट किया गया था ….ब्लॉग कि समस्या के कारण पोस्ट पे लिखी गई सभी टिपण्णी यहाँ से गायब हो चुकी है….दोस्तों से अनुरोध कि हो सके तो १ बार फिर से टिपण्णी देने में सहयोग करे

Anju Choudhary

प्रकाशित काव्य संग्रह: …’’क्षितिजा’’ ‘’ऐ री सखी’’ ‘’ठहरा हुआ समय’’ संपादन: १. “कस्तूरी” “अरुणिमा” ‘’पगडंडियाँ’’ ‘’गुलमोहर’’ ‘’तुहिन और गूँज’’ प्रकाशित साझा काव्य संग्रह में मेरी भी कविताएँ…….अनुगूँज, शब्दों की चहलकदमी,नारी विमर्श के अर्थ,सुनो समय जो कहता है,काव्य सुगंध, आकाश अपना अपना (सभी साँझा कविता संग्रह ) मुट्ठी भर अक्षर (साँझा कहानी संग्रह )…समाचार पत्र और पत्रिकाओं से जुडाव:

28 thoughts on “वो…राहें आज भी…..

  • May 12, 2011 at 1:13 PM
    Permalink

    “पर तेरे इन्तजार में वो..राहें आज भी” अनु बहुत ही मर्मस्पर्शी है आखिर की पंक्तियाँ. बिलकुल वैसे ही जैसे”किसी नजर को तेरा इन्तजार आज भी है”.

  • May 12, 2011 at 1:37 PM
    Permalink

    waqt ki bandisho se
    bebubiyado iljamo me
    dil ka har rishta
    dharashayee ho gaya….

    – sahi kaha aapne…ye bandishe aise hi bahut kuchh kar deti hai…aur bebuniyad iljam ke karan to rishta kabhi majboot nahi ho pata…fir bhi rishta to rishta hai…:)

    bahut pyari marmik aur bhawpurna rachna…:)

  • May 12, 2011 at 1:47 PM
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    MAM BAHUT PYARI KAVTA LIKHI HAI APNE. DHANYWAAD. . . . .0. .JAI HIND JAI BHARAT

  • May 12, 2011 at 1:55 PM
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    बहुत सुंदर लिखा आपने बस यु कहिये —रिस्ते जो थे अजीज दिलो जान की तरहा टूटे है तेरे शहर मै ईमान की तरहा !

  • May 12, 2011 at 4:56 PM
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    बहुत सुन्दर भावपूर्ण अभिव्यक्ति.आपके ब्लॉग पर पहली दफा आना हुआ.मन प्रसन्न हों गया आपकी जज्बाती रचना को पढकर.
    आप मेरे ब्लॉग पर आयीं इसके लिए बहुत बहुत आभार.आपका ब्लॉग फालो कर लिया है.धन्यवाद .

  • May 12, 2011 at 10:02 PM
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    अनु जी ब्लॉग पर आने के लिए आभार |सुंदर कविता लिखने के लिए बधाई और शुभकामनाएं |

  • May 12, 2011 at 10:55 PM
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    भावनाओं से ओत – प्रोत खुबसूरत रचना |

  • May 14, 2011 at 8:43 AM
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    भावमयी प्रस्तुति.
    ‘मुजरिम बुतों सी अब भी हूँ..,,
    तरसती हैं आँखे नम सी
    अपने प्यार के दीदार के लिए
    माना है हमने कि
    गुजर गए कारवां ‘

    दिल को छूते शब्द.
    आभार.

  • May 14, 2011 at 9:06 PM
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    सुन्दर जज्बातों से सजी एक सशक्त रचना। आभार।

  • May 14, 2011 at 11:13 PM
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    अंजू जी अगर अप अनुरोध नहीं भी करती तो टिपियाते तो जरुर क्योंकि बात ही कुछ ऐसी है , बधाई

  • May 15, 2011 at 7:01 AM
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    बढ़िया अभिव्यक्ति ….आप अपनी बात कहने में सफल हैं !
    काश हम दूसरों को देखने के वजाय, अपने को पहचानने का प्रयत्न करें !
    शुभकामनायें !

  • May 16, 2011 at 2:02 PM
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    प्यार और विछोह की
    मार्मिक शब्दों में
    प्रभावशाली अभिव्यक्ति …

  • May 16, 2011 at 3:48 PM
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    अंजू जी (अनु) आज पहली बार आप की कविता से रूबरू हो रहा हूँ…… सिर्फ ये कहना की आप अच्छा लिखती हैं…. कविता के साथ अन्याय ही होगा …. आप की ये कविता अगर दिल की कसौटी पर कस दी जाय तो …. अपने प्रकार की सर्वश्रेष्ठ रचनाओं में एक है…. बस थोड़ा सा…… निरन्तरता का अभाव दिखता हैं कही कही …

  • May 16, 2011 at 4:45 PM
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    बहुत खूब .. ये इश्क़ का दस्तूर है … गहरे जज्बातों को व्यक्त किया है …

  • May 16, 2011 at 4:52 PM
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    विभिन्न व्यवधानों के बाद आज आपके पास तक पहुंची हूँ, इसके लिए क्षमा.
    बहुत सुंदर लिखा है,

  • May 16, 2011 at 5:17 PM
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    आज पहली बार आपके ब्‍लाग पे आना हुआ …
    बहुत ही अच्‍छा लिखती हैं आप …

    इस बेहतरीन अभिव्‍यक्ति के लिये …

    बधाई के साथ शुभकामनाएं ।

  • May 17, 2011 at 2:58 PM
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    RAHEN HAMESHA WAHI HOTI HAIN KARWANA GUZAR JATE HAIN

    DHHOOL KE MANZAR BADI DUR AUR DER TAK NAZAR AATE HAIN

    KUCH CHARE RAHTE HAIN JINDAGI BHAR KE LIYE SATH APNE NAHIN JO HO PATE

    KUCH CHEHARE NA HOTE HUWE BHI SATH ZINDGI ME BAAR-2 YAAD AATE HAIN

  • June 6, 2011 at 10:21 AM
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    सुन्दर भावपूर्ण
    सुन्दर प्रस्तुति…. खुबसूरत रचना
    बेहतरीन अभिव्‍यक्ति..गहरे जज्बातों को व्यक्त किया है …
    सुंदर कविता लिखने के लिए बधाई
    http://shayaridays.blogspot.com

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