वीरानियाँ


क्यों उदास है मेरी ये जिन्दगी

खाली खाली सी क्यों लगती है मुझे
गर जिन्दगी रूठ जाये तो
ख़ुशी दूर हो गई मन से

बहुत वीरानियो से गुज़री है ये जिन्दगी
बहारो का अब कोई इंतज़ार भी नहीं है

रास्तो पे चलती भटकती है ये जिन्दगी ……
होगी कोई मंजली इसका भी पता नहीं है

दिल के दरवाज़े खिडकियों को यू किया बंद …….

पर मन की तुफ्फा से झूझती है ये जिन्दगी

आंधियो से कभी डर नहीं लगा हमहे …..

पर खुद के वजूद से ही डरती क्यों है ये जिन्दगी

मान अभिमान में डोलती ये जिन्दगी

अपने ही स्वाभिमान को तोडती ये जिन्दगी

((((((अंजु…..(अनु))))

Anju Choudhary

प्रकाशित काव्य संग्रह: …’’क्षितिजा’’ ‘’ऐ री सखी’’ ‘’ठहरा हुआ समय’’ संपादन: १. “कस्तूरी” “अरुणिमा” ‘’पगडंडियाँ’’ ‘’गुलमोहर’’ ‘’तुहिन और गूँज’’ प्रकाशित साझा काव्य संग्रह में मेरी भी कविताएँ…….अनुगूँज, शब्दों की चहलकदमी,नारी विमर्श के अर्थ,सुनो समय जो कहता है,काव्य सुगंध, आकाश अपना अपना (सभी साँझा कविता संग्रह ) मुट्ठी भर अक्षर (साँझा कहानी संग्रह )…समाचार पत्र और पत्रिकाओं से जुडाव:

12 thoughts on “वीरानियाँ

  • September 26, 2010 at 2:35 PM
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    मन के खिड़कियाँ दरवाजे कब बंद हुए हैं , कलम ले कर सब बह जाएगा , अच्छा प्रयास ।

  • September 26, 2010 at 8:08 PM
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    अंजू जी आपकी कविता मन के भावो को स्पष्ट कर रही है !
    बहुत सुंदर, बधाई !

  • September 27, 2010 at 11:55 AM
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    धन्यवाद शारदा जी और संतोष ……आपको मेरा लिखा पसंद आया

  • September 30, 2010 at 8:34 PM
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    मन अभिमान में डोलती यह जिंदगी
    अपने ही स्वाभिमान को तोडती यह ज़िन्दगी
    बहुत सुन्दर
    क्या बात कही आप ने

  • October 12, 2010 at 10:13 AM
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    dil ko chu lene wali rachna. shubhkamnaye

  • October 19, 2010 at 3:34 PM
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    udas jindagi ko apne kalmo se khushiya bhar den…:)

    bahut khub!!
    kabhi samay mile to hamare blog pe tasreef layen…

  • October 28, 2010 at 6:38 PM
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    ऐसी निराशा क़ि बात कहे …… जीवन बहुत लम्बा है …. अच्छा लिखा है …

  • November 18, 2010 at 5:45 PM
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    Likhte rahiye… man ko bahut sukun milta hai.. tanhayee sab door hone lagegi… achha likhti hai aap! Meri Shubhkamnayen aapke saath…

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