वजह हो तुम …….

वजह हो तुम …….
मन बेचैन है मेरा …

याद् बन गये हो,
क्यूंकि साथ नहीं हो तुम ………. हृदय में उतर जाते हो ,
मेरी स्पंदन हो तुम …..
मेरे होने की वजह ,
मीठा बंधन हो तुम ……
आँखों में बसते सपने हो तुम
आती हुई हवायो ने
कर दिया बेताब दरिया कि तरह
कली सी मुस्कान सजती रहे
तुम्हारे होंठो पे ,
जब ढूंढती हूँ कण – कण में ,
सब में व्याप्त हो तुम ,
कैसे भूलूँ तुम्हे पल भर को भी ,
मुझमे शुरू , मुझमे समाप्त हो तुम ..
(……कृति …अंजु..अनु ..)

Anju Choudhary

प्रकाशित काव्य संग्रह: …’’क्षितिजा’’ ‘’ऐ री सखी’’ ‘’ठहरा हुआ समय’’ संपादन: १. “कस्तूरी” “अरुणिमा” ‘’पगडंडियाँ’’ ‘’गुलमोहर’’ ‘’तुहिन और गूँज’’ प्रकाशित साझा काव्य संग्रह में मेरी भी कविताएँ…….अनुगूँज, शब्दों की चहलकदमी,नारी विमर्श के अर्थ,सुनो समय जो कहता है,काव्य सुगंध, आकाश अपना अपना (सभी साँझा कविता संग्रह ) मुट्ठी भर अक्षर (साँझा कहानी संग्रह )…समाचार पत्र और पत्रिकाओं से जुडाव:

3 thoughts on “वजह हो तुम …….

  • February 23, 2010 at 3:43 PM
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    Kese bhulu pal bhar ko bhi tumhe mujh hi se suru mujh hi se samapat ho tum. Bahut khub kya baat he adbhut

  • February 23, 2010 at 9:12 PM
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    ”कर दिया है बेताब दरिया की तरह” ये शब्द काफी बेचैन कर गए जैसे की कोई दरिया अपनी सीमायें भूलकर बहना चाहता हूँ,,,

  • May 5, 2010 at 12:01 AM
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    “जब ढूंढती हूँ कण कण मे, सबमे व्याप्त हो तुम” वास्तव मे “प्रेम” को देवता के रूप मे देखा जाय तो सचमुच कण कण मे व्याप्त है वो। क्या कहें शब्द चयन नायाब है। मन मे भाव उमड़ने से स्वमेव शब्द मानस पटल पर अंकित हो जाते हैं। सुन्दर रचना।

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