मौन खड़ी दीवारें

शायद……..थम जाए
ये मौन
हाथो की लकीरों के
किस्मत के दावों के
इस बड़े शहर की
गुम्बद और मीनारें के
मौन खड़ी दीवारों के
सड़क पर हो रहे तमाशे के

वो बेगुनाह ‘दामनियाँ’
जो हमेशा कैद होती रहती हैं
मोबाइल और कभी कैमरों में
उनके ही रचे नाटकों में

अंदर से बाहर तक
बेवजह अपने को
स्थापित करने के लिए
हर किसी की
सजीव सी काया को
क्यों बादल देते हैं
उसकी ही चीख़ों में
बन कर अंजान
क्यों !अपनी आंखे बंद कर लेते हैं
वो धूर्त इंसान

जब भी कभी
उम्मीद का एक दरवाज़
खुलता है
वो भी पैसे के आगे झुकता है
जिस दिल में प्यार और दर्द का
दरिया बहता है
वो ही बे-मौत क्यों मरता हैं?

चारों ओर
है हादसों का ज़ोर
हैं हर ओर इंसानियत के
आदमखोर
क्यों, जिंदगी हर पल इम्तेहान लगती है
बस पल-दो-पल की ही मेहमान लगती है

क्यों सदियों से वो ही
मन के दर्द और संवेदनाओं को
रात भर काँटों की आगोश में
सहलाती हैं
खुद को सभी से
जोड़ती और काटती हैं

जहां तक हो सका
महाप्रलय के बाद
हैवानियत के समंदर में
खामोशी से दीवारें नोचतीं हैं
फिर बूंद-बूंद कर खुद को
भरती हैं
फूल से पाक दामन को
पैबंदों से सिलती हैं

ये सोच कर कि
शायद……..थम जाए
ये मौन
हाथों की लकीरों के
किस्मत के दावों के
इस बड़े शहर की
गुम्बद और मीनारें के
मौन खड़ी दीवारों के
सड़क पर हो रहे तमाशे के ||

Anju Choudhary

प्रकाशित काव्य संग्रह: …’’क्षितिजा’’ ‘’ऐ री सखी’’ ‘’ठहरा हुआ समय’’ संपादन: १. “कस्तूरी” “अरुणिमा” ‘’पगडंडियाँ’’ ‘’गुलमोहर’’ ‘’तुहिन और गूँज’’ प्रकाशित साझा काव्य संग्रह में मेरी भी कविताएँ…….अनुगूँज, शब्दों की चहलकदमी,नारी विमर्श के अर्थ,सुनो समय जो कहता है,काव्य सुगंध, आकाश अपना अपना (सभी साँझा कविता संग्रह ) मुट्ठी भर अक्षर (साँझा कहानी संग्रह )…समाचार पत्र और पत्रिकाओं से जुडाव: