मै जी लूंगी…मै जी लूंगी …….


मै जी लूंगी…मै जी लूंगी ..…..
अजीब है इस दिल की हसरते भी
पास हो कर भी दूरियाँ हैं कितनी
छुने का मन करता है
पर उसके खो जाने का भी डर
सताता हैं
बैठे है हम पास उनके इतना
मन की आवाज़ को भी वो छू सकते है
जब भी बोलने लगे लब मेरे
वो क्यों धुँया सा हो जाते है ?

एहसास मेरे
शब्दों की भाषा समझते है
सुनता है दिल धडकनों को अगर
वो दर्द की दवा मांगता सा क्यों है?
हमने तो लफ़्ज़ों में उतरा है हर दर्द को
पर तुमने तो दर्द को ही हिस्सों में बाँट दिया है
लो शब्द तुम ले लो
एहसास मुझे देदो
जीत का सहेरा तुम पहनो
अपनी हार का जश्न मै मना लूंगी
खुद में जीने की तमन्ना मै जगा लूंगी
मेरी खुशियाँ आई जो दरवाज़े पर
उस में भी तुम अपनी हिस्सेदारी ले लो
मै खाली पड़े दिल में ही
खुद से जश्न मना लूंगी

मै जी लूंगी…..मै जी लूंगी….
(अंजु …चौधरी…..(अनु.)

Anju Choudhary

प्रकाशित काव्य संग्रह: …’’क्षितिजा’’ ‘’ऐ री सखी’’ ‘’ठहरा हुआ समय’’ संपादन: १. “कस्तूरी” “अरुणिमा” ‘’पगडंडियाँ’’ ‘’गुलमोहर’’ ‘’तुहिन और गूँज’’ प्रकाशित साझा काव्य संग्रह में मेरी भी कविताएँ…….अनुगूँज, शब्दों की चहलकदमी,नारी विमर्श के अर्थ,सुनो समय जो कहता है,काव्य सुगंध, आकाश अपना अपना (सभी साँझा कविता संग्रह ) मुट्ठी भर अक्षर (साँझा कहानी संग्रह )…समाचार पत्र और पत्रिकाओं से जुडाव:

2 thoughts on “मै जी लूंगी…मै जी लूंगी …….

  • August 12, 2010 at 8:12 AM
    Permalink

    किस खूबसूरती से लिखा है आपने। मुँह से वाह निकल गया पढते ही।

  • August 12, 2010 at 8:14 AM
    Permalink

    सूक्ष्म पर बेहद प्रभावशाली कविता…सुंदर अभिव्यक्ति..प्रस्तुति के लिए आभार जी

Comments are closed.