मै क्या हू …..?


मै क्या हू …..?
मै क्या सोचती हू ?
मै क्या चाहती हू ?
खुद नहीं जानती ……..
क्या पाना ,क्या खोना
मेरे लिए सब एक सा है ..
क्यूकि इस दिल से उम्मीद ….
शब्द ही मिट चुका है|
कभी सोचू………ऐसा करू ,
कभी सोचू …मै वैसा करू
ऐसे और वैसे के चक्रव्हिहू में ,
कभी कुछ नहीं किया |
कभी सोचू अपने लिए
थोडा सा तो जी लू
फिर सोचा …..वो क्या कहेगा
ये क्या कहेगा . ..सब क्या कहेगे
इसी सोच में , अपने लिए जीना ही छोड़ दिया |
कभी देश की हालत पे गंभीर हो लेती हू ,
पर दूसरे ही पल …सब लोगो संग हस देती हू
ये सोच की …सिर्फ मेरे सोचने भर से क्या होगा ,
मै क्या बोलू और क्या ना बोलू ..
कभी सोचा ही नहीं …..
मै क्या हू …..?
(….कृति….अनु …)

Anju Choudhary

प्रकाशित काव्य संग्रह: …’’क्षितिजा’’ ‘’ऐ री सखी’’ ‘’ठहरा हुआ समय’’ संपादन: १. “कस्तूरी” “अरुणिमा” ‘’पगडंडियाँ’’ ‘’गुलमोहर’’ ‘’तुहिन और गूँज’’ प्रकाशित साझा काव्य संग्रह में मेरी भी कविताएँ…….अनुगूँज, शब्दों की चहलकदमी,नारी विमर्श के अर्थ,सुनो समय जो कहता है,काव्य सुगंध, आकाश अपना अपना (सभी साँझा कविता संग्रह ) मुट्ठी भर अक्षर (साँझा कहानी संग्रह )…समाचार पत्र और पत्रिकाओं से जुडाव:

6 thoughts on “मै क्या हू …..?

  • March 17, 2009 at 11:57 PM
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    ese or bese ke chakrviu me jisne jee liya
    us hi ne to sab kuchh kar liya
    jeewan ki is jang ko sahki jeet liya
    jisne socha koi kya kahega
    phikr kari jisne jamane ki
    usne hi to apne liye sab kuchh jiya
    jo jiya sab ke liye uska jeewan hi to jeewan hua vk

  • May 28, 2009 at 11:32 PM
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    I’m sorry I can’t tell you what
    I’m sure you’d rather hear,
    But there’s a burden in my heart
    I can no longer bear.

  • June 21, 2009 at 7:13 PM
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    जब जीवन मे उमंग होती हे तो ‘चंचलता’ आती हे , पर जब जीवन मे निराशा होती हे तो अस्थिरता आती हे , मन बेचैन रहता हे .
    हर सोच को एक सुरंग मे हो कर गुजरना होता हे , चाहे वो उमंग हो या फिर निराशा. अगर मन मे निराशा हे , तो बेचैनी हे , मन टिक नहीं पाता किसी एक विषय पर, ना ही किसी एक सोच पर ! अगर हम बुधी को स्थिर रख अभ्यास से मन को स्थिर करने की चेष्टा करें तो मन धीरेधीरे स्थिर होने लगता हे जी….बस धयान इतना रखे की अभ्यास करते हुए ,निराशा को बल पूर्वक आपने से अलग रखना होता हे जी !

    Aapne styata purvak apne man ko kavita mey udhael diya hey , bahut sundar likha hey aapne ; prabhu aapko va aapki kalam mey shakti dey !

  • September 26, 2009 at 10:33 PM
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    जो लीखा है सच ही लीखा है यार….
    सभी शब्द अपने से लेगे…शायद सभी ये सोचते हैं …
    तुमने सबके दिल की बात लिख दी यार,,,बहुत खूब…

    पर दुसरे ही पल सब …लोगों संग हस लेती हूँ…
    ………………………………………..
    सही कहती हो यार हसना ही चाहिए ..हसना जिन्दगी की जरूरत है..
    जिन्दगी जियो तो इस अंदाज़ में की तुम्हे देख के लगे जिन्दगी कितनी ख़ूबसूरत है…

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