मै ….और …..तुम

चित्र आभार ….रोज़ी सचदेवा ………………..

मै ….और …..तुम


मैंने अपने आप को
शब्दों में ढाल लिया
खुद को मायाजाल
में फांस लिया
देख और समझ
कर भी सच्चाई को
मुंह मोड़ लिया …खुद के
जीने के लिए …
अस्तित्व की लडाई में
दिल पर नश्तर हज़ार लिए
******
जब भी मौका मिला तुम्हे
नहीं चुके तुम मेरा शरीर
रगड़ने से
अब खुद कि आँखों से वो
भोलापन कहाँ गया ?????
समय बीता …बीते बसंत हज़ार
फिर भी क्यों ये जीवन है
कुछ है आधा अधूरा सा
क्यों मिलती है इस में
खाली और अपूर्ण जीवन
की झलक बार बार
तुम पल पल चुकते गए
मै वक़्त दर वक़्त
सागर बनती गई
मन की तुम्हारी विकृतियाँ
मुझ में आ आ कर
मिलती गई
अब काल्पनिक जीवन की
तस्वीरों के साये में
कटने लगे है …
मेरे ये दिन और रात
मिट गया मुझ में ” मै ”
होने का एहसास
पर…तुम ”तुम” बने रहे ……..
पर…तुम ”तुम” बने रहे ……..
((अनु…))

Anju Choudhary

प्रकाशित काव्य संग्रह: …’’क्षितिजा’’ ‘’ऐ री सखी’’ ‘’ठहरा हुआ समय’’ संपादन: १. “कस्तूरी” “अरुणिमा” ‘’पगडंडियाँ’’ ‘’गुलमोहर’’ ‘’तुहिन और गूँज’’ प्रकाशित साझा काव्य संग्रह में मेरी भी कविताएँ…….अनुगूँज, शब्दों की चहलकदमी,नारी विमर्श के अर्थ,सुनो समय जो कहता है,काव्य सुगंध, आकाश अपना अपना (सभी साँझा कविता संग्रह ) मुट्ठी भर अक्षर (साँझा कहानी संग्रह )…समाचार पत्र और पत्रिकाओं से जुडाव:

34 thoughts on “मै ….और …..तुम

  • May 31, 2011 at 12:48 AM
    Permalink

    मिट गया मुझ में ‘मैं’
    होने का अहसास
    पर ..तुम “तुम” बने रहें …
    पर ..तुम “तुम” बने रहें….

    आपके कवि हृदय से उमड़ी भावों की सरिता दिल पर टक्कर मारती है.
    सुन्दर अनुपम प्रस्तुति के लिए आभार.

    मेरे ब्लॉग पर भी आकर अपने सुविचारों की कुछ छटा बिखेरियेगा.

  • May 31, 2011 at 8:48 AM
    Permalink

    मिट गया मुझमें में मै ………खूबसूरत अहसास बधाई

  • May 31, 2011 at 1:47 PM
    Permalink

    वाह ! बेहद खूबसूरत अहसास को संजोया इस प्रस्तुति में आपने …

  • May 31, 2011 at 4:23 PM
    Permalink

    सच कहा तुम तुम बने रहे और मै , मै ना रही…………।सुन्दर भावाव्यक्ति।

  • June 1, 2011 at 11:01 AM
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    बहुत सुन्दर भाव और अभिव्यक्ति के साथ लाजवाब रचना लिखा है आपने जो काबिले तारीफ़ है! उम्दा प्रस्तुती!

  • June 1, 2011 at 6:56 PM
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    जब भी मौक़ा मिला तुम्हें
    नहीं चुके तुम मेरा शरीर
    नोचने से ….

    क्रूर मनुष्यता का मासूम स्त्री के प्रति व्यवहार
    और मन के अजब ताने-बाने को सहेजे हुए
    एक अच्छी कृति निर्मित की है….
    तुम….. तुम बने रहे !!

  • June 2, 2011 at 9:41 AM
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    अनु जी
    वंदना जी के माध्यम से आपके यहाँ आना हुआ और सच कहूँगा व्यर्थ नहीं रहा, आपका फोलोवर बन रहा हूँ तो अब आता रहूंगा आप को पढने!
    आपका भी स्वागत है मेरे ब्लॉग पर, आशा करता हूँ आप आकर अनुग्रहीत करेंगी!
    सुरेन्द्र “मुल्हिद”

  • June 2, 2011 at 11:22 AM
    Permalink

    mit gaya mujhme “main”…
    par tum “tum” hi bane rahe…:)
    kya kahun….bahut hi dard dikh gaya…sirf main aur tum jaise do sabdo se hi…!!
    tumhari rachna…me alag si pahchaan hai…!!
    lekin kuchh shuru ke shabd janche nahi …unhe kuchh aur tarike se kaha ja sakta tha….
    please anyatha na lena…!!

  • June 2, 2011 at 11:47 AM
    Permalink

    आपकी पोस्ट आज के चर्चा मंच पर प्रस्तुत की गई है ,.
    कृपया पधारें
    चर्चा मंच

  • June 3, 2011 at 11:03 AM
    Permalink

    namaskaar !
    behad gahree aur khuli bebaaki se apni apni abhivyakti pradan ki hai , main aur tum se simtte hue magar jitna simte utnaa hi ubhar ke saamane aayi sunder prastuti , badhai .
    saadar

  • June 3, 2011 at 7:26 PM
    Permalink

    बहुत भावपूण रचना है…एक अनजाने दर्द का अहसास…

  • June 3, 2011 at 8:57 PM
    Permalink

    आदरणीया अंजु जी
    सादर सस्नेहाभिवादन !

    मन के कोमल भावों की सुंदर प्रस्तुति है –
    तुम पल पल चुकते गए
    मै वक़्त दर वक़्त
    सागर बनती गई


    आपके ब्लॉग पर लगे चित्र भी बहुत ख़ूबसूरत और आपकी कलाप्रियता के परिचायक हैं …

    आपको हृदय सेबधाई और शुभकामनाएं !

    – राजेन्द्र स्वर्णकार

  • June 4, 2011 at 9:06 PM
    Permalink

    किसी ने कहा है–

    जो चीज इकहरी थी वह दोहरी निकली
    सुलझी हुई जो बात थी उलझी निकली
    सीप तोड़ी तो उसमें से मोती निकला
    मोती तोड़ा तो उसमें से सीप निकली।

    आभार

  • June 5, 2011 at 12:16 AM
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    aap sab ka shukriya….meri kavita ko pasand karne ke liye…

  • June 5, 2011 at 9:43 AM
    Permalink

    आदरणीय अनु जी
    एक गहरा चिंतन प्रस्तुत किया है आपने इस कविता में ..जीवन और अस्तित्व को प्रकट करती रचना हमारे सामने इन दोनों महता को प्रस्तुत करती है ….आपका आभार

  • June 5, 2011 at 4:48 PM
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    वाह! बहुत ही सुन्दर अभिव्यक्ति!

  • June 7, 2011 at 1:53 PM
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    नारी मन को समझने के लिए एक दस्तावेज़ है यह कविता… ‘तुम’ का ‘तुम’ बने रहना स्त्री और पुरुष के बीच मनोवैज्ञानिक अंतर की ओर इशारा कर रहा है.. बेहद शसक्त अभिव्यक्ति…

  • June 8, 2011 at 10:28 AM
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    इस रचना में भावना का वैसा ही समन्वय |
    तुम – तुम ही बने रहे , तुम – तुम ही बने रहे |
    सुन्दर रचना |

  • June 8, 2011 at 4:46 PM
    Permalink

    kewal ram ji…nilesh ji…arun ji…minakshi ji

    bahut bahut shukriya meri kavita ko pasand karne ke liye

  • July 5, 2011 at 8:13 PM
    Permalink

    Mai waqt ke santh sagar banti gaai
    bahut gahrai he aap ki baat me bas itna hi kaha ja sakta he ki adbhut adbhut adbhut………

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