बदलते रिश्ते

मै जब भी उस से मिलती हूँ
क्यों उस जैसी हो जाती हूँ
उसके ख्यालो को सोचती हूँ
उसकी ही आहटो पे चलती हूँ
उसकी दी हुई बोली ही बोलती हूँ
फिर भी क्यों वो ….
मेरी तरह नहीं सोचता
मेरी बोली क्यों नहीं बोलता ?

मै उसके दिल को पढ़ती हूँ
उसके शब्दों को लिखने से पहले
समझती हूँ …
उसकी सांसो को जीती हूँ
उसी के दिए नगमे गाती हूँ
उसकी यादो को दिल में बसा
सपनो की एक हसीन दुनिया सजा
उसी में खो जाती हूँ …
फिर भी क्यों वो ……
मेरी तरह नहीं सोचता
मेरी बोली क्यों नहीं बोलता ?

वहीँ तो घर था मेरा
वहीँ तो मै उस संग खेली थी
पहला घर घर अपना
वहीँ तो मैंने अपने सपनो की
दुनिया सजाई थी
आज वो बिछड़ गया है
उसकी अगल ही दुनिया है
अलग है सपने उसके
बदल गयी है हम दोनों की तकदीरे
अब किस उम्मीद से मै अब ये कहूँ..

कि क्यों नहीं वो मेरे जैसा सोचता????????
(अंजु ….(अनु )

Anju Choudhary

प्रकाशित काव्य संग्रह: …’’क्षितिजा’’ ‘’ऐ री सखी’’ ‘’ठहरा हुआ समय’’ संपादन: १. “कस्तूरी” “अरुणिमा” ‘’पगडंडियाँ’’ ‘’गुलमोहर’’ ‘’तुहिन और गूँज’’ प्रकाशित साझा काव्य संग्रह में मेरी भी कविताएँ…….अनुगूँज, शब्दों की चहलकदमी,नारी विमर्श के अर्थ,सुनो समय जो कहता है,काव्य सुगंध, आकाश अपना अपना (सभी साँझा कविता संग्रह ) मुट्ठी भर अक्षर (साँझा कहानी संग्रह )…समाचार पत्र और पत्रिकाओं से जुडाव:

11 thoughts on “बदलते रिश्ते

  • February 24, 2011 at 11:26 AM
    Permalink

    main uske dil ko padhti ho
    uske sabdo ko leekhne se pahle samajhti hoon..:)

    bahut khub…itna samjha tabhi to itna pyara sa likha!!

  • March 4, 2011 at 7:23 AM
    Permalink

    फिर भी वह क्यों नहीं मेरी तरह सोचता …..नए विषय को उकेरा है आपने ,बधाई शायद आपके व्लाग पर पहली बार आया हूँ |

  • March 6, 2011 at 12:41 PM
    Permalink

    आपका ब्लॉग बहुत पसंद आया है! बहुत सच्ची बातें कहीं हैं!

  • December 18, 2011 at 1:31 PM
    Permalink

    आपकी यह प्रस्तुति बहुत ही अच्छी लगी.
    बहुत बहुत आभार सुनीता जी की हलचल का.

    मेरी प्रार्थना थी कि आप मेरे ब्लॉग पर आतीं
    अपनी टिपण्णी रुपी प्रसाद से मुझे हर्षित कर जातीं.

    पर लगता है मैं आपके प्रसाद के शायद मैं लायक नही.

Comments are closed.