प्रेम दीवानी

प्रेम दीवानी

सूरज की गरमी ,चन्दा की ठंडक
इसमें छिपे अनंत बसंत
अपनी बानी प्रेम की बानी
इसकी सियाई आँखों का पानी

जिसको ना घर समझे
ना समझे गली दीवानी
जिसकी हर अदा पर
मर गई ये
मीरा दीवानी ….

मै तो हूँ एक पिंजरे के मैना
जात अजानी ,नाम अनजाना
कहीं ना उसका ठौर ठिकाना ,
दिल है शोला ,आँखों में शबनम
कुछ चोट लगी बाहर थी
कुछ चोट लगी भीतर थी
शबनम की बूंदों तक पर
निर्दयी धूप की कड़ी नज़र थी
कोई था बदहाल धूप में
कोई था ग़मगीन छावं में
जिसको अपनाया उसकी
याद संजोई मन में ऐसे
जो दीवा जले तुलसी-पूजन में
आज भले ही तुम कुछ भी
कहें लो ….
मै उसकी हो गई जी
जो थाम के जिगर उठा ,
जो मिला के नज़र
इस प्रेम द्वारे झुका जी

((anu))
anu

Anju Choudhary

प्रकाशित काव्य संग्रह: …’’क्षितिजा’’ ‘’ऐ री सखी’’ ‘’ठहरा हुआ समय’’ संपादन: १. “कस्तूरी” “अरुणिमा” ‘’पगडंडियाँ’’ ‘’गुलमोहर’’ ‘’तुहिन और गूँज’’ प्रकाशित साझा काव्य संग्रह में मेरी भी कविताएँ…….अनुगूँज, शब्दों की चहलकदमी,नारी विमर्श के अर्थ,सुनो समय जो कहता है,काव्य सुगंध, आकाश अपना अपना (सभी साँझा कविता संग्रह ) मुट्ठी भर अक्षर (साँझा कहानी संग्रह )…समाचार पत्र और पत्रिकाओं से जुडाव:

41 thoughts on “प्रेम दीवानी

  • June 18, 2011 at 9:48 PM
    Permalink

    जिसको अपनाया उसकी
    याद संजोई मन में ऐसे
    जो दीवा जले तुलसी-पूजन में
    bahut khoob

  • June 18, 2011 at 11:54 PM
    Permalink

    MAM BAHUT KHUBSURAT KAVITA LIKHI HAI APNE..
    JAI HIND JAI BHARAT

  • June 19, 2011 at 1:30 AM
    Permalink

    याद संजोई मन में ऐसे
    जो दीवा जले तुलसी-पूजन में

    ये दो पंक्तियां गोपाल दास नीरज की याद दिला गयी।
    सुंदर कविता है।
    आभार

  • June 19, 2011 at 8:46 AM
    Permalink

    मै तो हूँ एक पिंजरे के मैना
    जात अजानी ,नाम अनजाना
    कहीं ना उसका ठौर ठिकाना ,
    दिल है शोला ,आँखों में शबनम
    कुछ चोट लगी बाहर थी
    कुछ चोट लगी भीतर थी

    अनु जी

    बहुत ही अच्छी कविता हे
    आप का बहुत बहुत धन्यवाद!

  • June 19, 2011 at 9:37 AM
    Permalink

    कोई था बदहाल धूप में
    कोई था ग़मगीन छावं में— शायद इन्सान को किसी तरह चैन नही । लेकिन आपके समर्पण के लिये शुभकामनायें। सुन्दर रचना।

  • June 19, 2011 at 1:10 PM
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    बहुत सुन्दर एवं भावपूर्ण रचना ! मेरी बधाई स्वीकार करें !

  • June 19, 2011 at 5:12 PM
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    प्रेम पर सदियों से लिखा जा रहा है… दीवानगी पर वर्षों लिखा गया है… लेकिन नदी की तरह जिस तरह यह कविता बह रही है प्रेम के प्रति पागलपन नए क्षितिज पर है… कविता एक सांस में पढ़ गया और यह दिल में उतर गई…. सुन्दर कविता…

  • June 19, 2011 at 5:22 PM
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    रचना के भाव प्रत्यक्षतः निरूपित हैं…. पर यह अतिरंजित रूप हैं मीरा और राधा का युग बीत गया अब ..शाश्वत प्रणय केवल संभाषण और उत्कर्ण में ही प्रेरित करता हैं समर्पण हालाँकि साधिकार ही होता हैं पर समर्पण और अतिक्रमण को बहुत महीन रेखा विभाजित करती हैं
    रचना अंतस की जद्द-ओ-जहद को बखूबी बयां करती हैं पर रवानगी में पशोपेश हैं की उलाहना हैं या समर्पण…शेष ..बहुत खूबसूरत लिखा हैं

  • June 19, 2011 at 7:56 PM
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    आपकी रचनात्मक ,खूबसूरत और भावमयी
    प्रस्तुति भी कल के चर्चा मंच का आकर्षण बनी है
    कल (20-6-2011) के चर्चा मंच पर अपनी पोस्ट
    देखियेगा और अपने विचारों से चर्चामंच पर आकर
    अवगत कराइयेगा और हमारा हौसला बढाइयेगा।

    http://charchamanch.blogspot.com/

  • June 20, 2011 at 7:29 AM
    Permalink

    एक कृष्ण दीवानी मीरा , एक दीवानी इस कविता में
    प्रेम को समर्पित खूबसूरत कविता !

  • June 21, 2011 at 12:57 AM
    Permalink

    शबनम की बूंदों तक पर
    निर्दयी धूप की कड़ी नज़र थी
    कोई था बदहाल धूप में
    कोई था ग़मगीन छावं में
    आपकी कविता में कथ्य और संवेदना का सहकार है जिसका मकसद इस संसार को व्यवस्थित और प्रेममय देखने की आकांक्षा है।

  • June 21, 2011 at 3:02 PM
    Permalink

    सुन्दर भाव और अभिव्यक्ति के साथ लाजवाब रचना लिखा है आपने ! बधाई!

  • June 21, 2011 at 3:53 PM
    Permalink

    प्रेम में समर्पण ,प्रेम की उत्कृष्ट अभिव्यक्ति है . भाव प्रवण कविता .

  • June 21, 2011 at 8:36 PM
    Permalink

    आज भले ही तुम कुछ भी
    कहें लो ….
    मै उसकी हो गई जी
    जो थाम के जिगर उठा ,
    जो मिला के नज़र
    इस प्रेम द्वारे झुका जी

    bahut khoob!!!!

    isse pichhli rachna ishq ki mulakaat bhi laajawaab hai………..

  • June 21, 2011 at 10:36 PM
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    “जिसको अपनाया उसकी
    याद संजोई मन में ऐसे
    जो दीवा जले तुलसी-पूजन में”

    बहुत बढ़िया…

  • June 22, 2011 at 11:26 AM
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    सूरज की गरमी ,चन्दा की ठंडक
    इसमें छिपे अनंत बसंत
    अपनी बानी प्रेम की बानी
    इसकी सियाई आँखों का पानी
    क्या आज भी है ऐसी दीवानी.? ……आभार …. बहुत सुन्दर …

  • June 22, 2011 at 1:36 PM
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    कुछ चोट लगी बाहर थी
    कुछ चोट लगी भीतर थी

    कुछ खोट रही थी अंतर में —
    थपकाने से अब बेहतर है |

    हूँ कुम्भकार की रचना मैं –
    एह्सान सदा ही मुझ पर है ||

    पर हक़ उसका सबसे ज्यादा –
    जो दिल में है वो दिलवर है ||

  • June 23, 2011 at 12:02 PM
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    “मै उसकी हो गई जी
    जो थाम के जिगर उठा ,
    जो मिला के नज़र
    इस प्रेम द्वारे झुका जी”
    बहुत बेहतरीन और सारगर्भित बात उभरकर आयी है.प्रेम की इन्तहा शायद यही है,यही हो.

  • June 25, 2011 at 8:33 PM
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    मै उसकी हो गई जी
    जो थाम के जिगर उठा ,
    जो मिला के नज़र
    इस प्रेम द्वारे झुका जी… प्रेम में समर्पण का सुन्दर भाव और सुन्दर अभिव्यक्ति…
    अनु जी आप मेरे ब्लांग में आई ..बहुत बहुत धन्यवाद..

  • June 25, 2011 at 11:41 PM
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    आप सभी मित्रो का मेरे ब्लॉग पर आने के लिए धन्यवाद
    ऐसे ही अपने विचारो से मेरा हौंसला बढ़ाते रहे ………..आभार

  • June 27, 2011 at 2:14 PM
    Permalink

    सच. बहुत ही सुंदर भाव.. क्या बात है..

    जो दीवा जले तुलसी-पूजन में
    आज भले ही तुम कुछ भी
    कहें लो ….
    मै उसकी हो गई जी
    जो थाम के जिगर उठा ,

  • June 28, 2011 at 11:46 AM
    Permalink

    मै उसकी हो गई जी
    जो थाम के जिगर उठा ,
    जो मिला के नज़र
    इस प्रेम द्वारे झुका जी…
    वाह …बहुत खूब कहा है आपने ।

  • June 29, 2011 at 1:27 PM
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    kya kahun, bahuto ne bahut kuchh kah diya..sach me kahin se prem bah raha hai….samajh me aa raha hai..:)

  • July 2, 2011 at 12:34 AM
    Permalink

    mahendr ji…sada ji…mukhe ji aap sabka shukriya…ki aapne dil se meri kavita ko padha
    bahut bahut aabhar

  • July 5, 2011 at 8:03 PM
    Permalink

    Mai ho gaai uski jo tham ke jigar uttha , jo mila ke najar is prem duar jhuka jhuka.
    Bahut sundar waaaaah

  • July 7, 2011 at 6:40 PM
    Permalink

    awsome poem……… dil ko chu gayi bua………

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