जब भी खुद को आईने मे देखा…………..


जब भी खुद को आईने मे देखा
उसे भी मुझ पे हँसते पाया …
वक़्त के हाथो खुद को लुटा पाया ..
मै तो अंधेरो मे खो जाती ….
इस दुनिया की  भीड़ मे ..
अगर ..वो
मेरा हाथ न थामता…..
खीँच लाया वो मुझे अंधेरो से बाहर …..
उसकी निगाहों ने तराशा है मुझे ..
उसकी  बातो से मिला है ..
जीवन मे नया रूप मुझे ..
मै तो खो चुकी थी ..
आत्मविश्वास अपना …
पर उसकी बदौलत ..
जी ली मैने भी …
अपने सपनो की  दुनिया ..
मिला प्यार इतना ….कि
मैंने खुद को उसके लिए बदल डाला..
समय पे साथ चलके उसे ने …
मुझे नयी ताकत से रूबरू ..
करवा डाला …
मेरी जीने की  इच्छा को
फिर से उसने ..जीवंत कर डाला …………
अब जब भी खुद को आईने मे देखा
अपना नया सा रूप है मैंने पाया |
(………कृति…….अनु……)

Anju Choudhary

प्रकाशित काव्य संग्रह: …’’क्षितिजा’’ ‘’ऐ री सखी’’ ‘’ठहरा हुआ समय’’ संपादन: १. “कस्तूरी” “अरुणिमा” ‘’पगडंडियाँ’’ ‘’गुलमोहर’’ ‘’तुहिन और गूँज’’ प्रकाशित साझा काव्य संग्रह में मेरी भी कविताएँ…….अनुगूँज, शब्दों की चहलकदमी,नारी विमर्श के अर्थ,सुनो समय जो कहता है,काव्य सुगंध, आकाश अपना अपना (सभी साँझा कविता संग्रह ) मुट्ठी भर अक्षर (साँझा कहानी संग्रह )…समाचार पत्र और पत्रिकाओं से जुडाव:

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