क्या पाया क्या खोया है ….

क्या पाया क्या खोया है ….

कभी सोचा था कि
वक़्त को कसके मुट्ठी
में बांधूंगी !
ये जानते हुए भी –
ना वक़्त रुकता है
न रात रूकती है
ना रुके ये सुबह
न दिन न शाम ………
फिर भी यादे है कि
सफ़ेद हँस सी चली आती है
खोजती है बसेरा ..वो मन की
तेज़ी -ए-रफ़्तार में …..

वक़्त हाथो से
खिसकता रहा
जो कल थे बच्चे
आज वो जवाँ हो गए
अकेले रास्तो में चल रहा
सूरज भी थक गया ….
रोशनी भी मन की
संकरी गलियों
में भटक गई
बताने लायक बात
गले में अटक गई ….
कैसी रात सन्नाटे
भरी आ गई
हाथ अपने पसारे ही
दिखते नहीं…
सोचते सोचते सर
फट गया ..

कैसे सुलझाये उलझे
संबंधो के धागे
सुलझते सुलझते कहीं ये
अलग अलग ना हो जाए .
कैसे मन का द्वेष मिटेगा
अपनों से ..
कहीं उनके मन का
प्रेम ही
ना मर जाए …
ये तो कैसा खेल समय
के सकुनी का
जिसके पासो की
चाल समझ ना आती …..
कहना है जो बात
वो कही ना जाती …
ऐसा भवर उठा मन मे
की सागर
भी बेहाल हुआ
कैसी राते काली है
ये मेरे जीवन की
जिनमे पता नहीं

क्या पाया क्या खोया है …..?

(अनु )

Anju Choudhary

प्रकाशित काव्य संग्रह: …’’क्षितिजा’’ ‘’ऐ री सखी’’ ‘’ठहरा हुआ समय’’ संपादन: १. “कस्तूरी” “अरुणिमा” ‘’पगडंडियाँ’’ ‘’गुलमोहर’’ ‘’तुहिन और गूँज’’ प्रकाशित साझा काव्य संग्रह में मेरी भी कविताएँ…….अनुगूँज, शब्दों की चहलकदमी,नारी विमर्श के अर्थ,सुनो समय जो कहता है,काव्य सुगंध, आकाश अपना अपना (सभी साँझा कविता संग्रह ) मुट्ठी भर अक्षर (साँझा कहानी संग्रह )…समाचार पत्र और पत्रिकाओं से जुडाव:

38 thoughts on “क्या पाया क्या खोया है ….

  • July 19, 2011 at 12:04 PM
    Permalink

    मुट्ठी में रेत बांधो , तो जितनी कस कर बांधो – उतनी जल्दी फिसलती है | मुट्ठी खोल दो – तो अनंत तक हथेली पर धरी रहेगी वही रेत …
    सुन्दर कविता …

  • July 19, 2011 at 12:05 PM
    Permalink

    मन की उलझनों को सुलझाने की जुगत में लगी सुन्दर कविता

  • July 19, 2011 at 12:11 PM
    Permalink

    khona pana jindagi ka naam hai…
    umra bit ti hai, kuchh na kuchh judta rahta hai….naya:) to kuchh khote bhi hain..!
    kash ham waqt ko bandh paate!!

    waise har panktiyan lajabab!

  • July 19, 2011 at 12:16 PM
    Permalink

    “कभी सोचा था कि
    वक़्त को कसके मुट्ठी
    में बांधूंगी !”
    हर कोई यही सोचता है,मगर ऐसा कहाँ होता है.जीवन पहाड़ से उतरती नदी सा है,सागर में समा के ही दम लेता है.इमानदार भवों की अभिव्यक्ति.

  • July 19, 2011 at 12:17 PM
    Permalink

    कई बार जानते बूझते भी ऐसा कुछ कर जाने को दिल कर जाता है….उम्दा रचना.

  • July 19, 2011 at 1:13 PM
    Permalink

    ये पंक्तियाँ बहुत अच्छी हैं-
    ये जानते हुए भी –
    ना वक़्त रुकता है
    न रात रूकती है
    ना रुके ये सुबह
    न दिन न शाम ………
    फिर भी यादे है कि
    सफ़ेद हँस सी चली आती है
    खोजती है बसेरा ..वो मन की
    तेज़ी -ए-रफ़्तार में …..

  • July 19, 2011 at 1:18 PM
    Permalink

    कैसे सुलझाये उलझे
    संबंधो के धागे
    सुलझते सुलझते कहीं ये
    अलग अलग ना हो जाए .
    कैसे मन का द्वेष मिटेगा

    उलझन में डूबी कश्मकश …अच्छी प्रस्तुति

  • July 19, 2011 at 1:36 PM
    Permalink

    यही कशमकश एक दिन मंज़िल भी दिखाती है।

  • July 19, 2011 at 2:17 PM
    Permalink

    क्या खोया क्या पाया ??
    चैन खोया दर्द पाया
    फिर भी मन न अघाया–
    कलम चूमी गम गाया
    फिर भी मन भरमाया ||

    बहुत सुन्दर प्रस्तुति ||

  • July 19, 2011 at 3:41 PM
    Permalink

    कैसे सुलझाये उलझे
    संबंधो के धागे
    सुलझते सुलझते कहीं ये
    अलग अलग ना हो जाए

    bahut hee khoobsoorat soch ke saath likhi hui aapki ye rachna!

  • July 19, 2011 at 5:38 PM
    Permalink

    कैसे सुलझाये उलझे
    संबंधो के धागे
    सुलझते सुलझते कहीं ये
    अलग अलग ना हो जाए .
    वाह ! बेहद खूबसूरती से कोमल भावनाओं को संजोया इस प्रस्तुति में आपने …

  • July 19, 2011 at 5:57 PM
    Permalink

    kis ne roke panv smy ke kaun chla soorj ke aage
    har gya iswr bhi is se smy rha hai sb se aage
    yh ek schchai hai jise aap ne phchana hai
    bdhai

  • July 19, 2011 at 6:24 PM
    Permalink

    वक्‍त को कसकर पकड़ने के बजाय पकड़ना था उसका हाथ

    और चलना था साथ साथ…..

    बेहतरीन भावाभिव्‍यक्ति

  • July 19, 2011 at 10:39 PM
    Permalink

    Bahut hi gahri baten chupi hui hain is rachna me……… Achi lagi apki ye rachna.
    Jai hind jai bharatBahut hi gahri baten chupi hui hain is rachna me……… Achi lagi apki ye rachna.
    Jai hind jai bharat

  • July 19, 2011 at 10:57 PM
    Permalink

    सभी तो यही चाहते है कि वक्त को रोक लें। पर ये संभव तो नही है। खुबसुरत रचना। आभार।

  • July 20, 2011 at 4:13 PM
    Permalink

    Ashok Arora
    anju ..phichhale dino teji se ghate ghatanakram ko aap bahut achchhi abhivyakt kiya…hai…Samay ko kaun nahi rokana chahata..par ye ret kee tarah saath phisal jaataa hai…aur is me samay ka bhee kya dosh….chalana to iski niyati hai…samajhadaar wo hi hai jo samay ke saath khud bhee chal padae…..
    Aap anju bahut sunder lakhati hain..God bless u..

  • July 20, 2011 at 4:31 PM
    Permalink

    क्या पाया क्या खोया है ……?

    बदलते वख्त के साथ संबंधों का मार्मिक विश्लेषण ……सुन्दर एवं भावपूर्ण

  • July 20, 2011 at 8:14 PM
    Permalink

    कैसे सुलझाये उलझे
    संबंधो के धागे
    सुलझते सुलझते कहीं ये
    अलग अलग ना हो जाए .
    कैसे मन का द्वेष मिटेगा
    अपनों से ..
    कहीं उनके मन का
    प्रेम ही
    ना मर जाए …

    अति सुन्दर , संबंधों के धागे को बहुत संभल कर रखना पड़ता है |

  • July 21, 2011 at 12:15 PM
    Permalink

    अनु जी आप की कविता तो बहुत ही अच्छी और जीवन का आइना दिखने वाला हे और सच कहू तो मुझे आप की कविता का इंतजार रहता हे

    पर आप की कविताओ के लिये मेरे पास शब्द नहीं होते हे

    आप मेरी ख़ामोशी को ही मेरे शब्द समझे

  • July 21, 2011 at 4:24 PM
    Permalink

    isi khone aur pane me to sari jidagi gujar di hamne ,
    bhavpurn aur dharapravah rachna ke liye hardik badhayi

  • July 21, 2011 at 4:28 PM
    Permalink

    आदरणीया अंजू चौधरी जी हार्दिक अभिवादन सुन्दर रचना प्यार से सुलझाएं सब सुलझ जाता है प्यार भर जाता है चिराग जल जाता है रातें काली नहीं फिर चाँद खिल जाता है
    कैसे सुलझाये उलझे
    संबंधो के धागे
    सुलझते सुलझते कहीं ये
    अलग अलग ना हो जाए .
    धन्यवाद -शुभ कामनाएं
    शुक्ल भ्रमर ५
    भ्रमर का दर्द और दर्पण

  • July 21, 2011 at 11:08 PM
    Permalink

    क्या खोया क्या पाया ??
    चैन खोया दर्द पाया
    फिर भी मन न अघाया–
    कलम चूमी गम गाया
    फिर भी मन भरमाया ||
    …….अति सुन्दर , संबंधों के धागे को बहुत संभल कर रखना पड़ता है |

  • July 26, 2011 at 5:31 PM
    Permalink

    kya khoya kya payaa…ek ati sunder rachanaa hai..aur ANU ji aap is ke liye…badhaee ki paatra hain….aese hi likhat rahe..ye hi meri shubhkamanaaye hai…….

  • July 26, 2011 at 5:49 PM
    Permalink

    बताने लायक बात
    गले में अटक गई ….

    bahut hi saralta se keh di barson ki gale mein atki baat

    abhar

    Naaz

  • July 28, 2011 at 12:22 PM
    Permalink

    http;//sukh-riya.blogspot.com/
    kya khoya kya payaa…ek ati sunder rachanaa hai..aur ANU ji aap is ke liye…badhaee ki paatra hain….aese hi likhat rahe..ye hi meri shubhkamanaaye hai…….

  • July 28, 2011 at 1:35 PM
    Permalink

    http;//sukh-riya.blogspost.com/
    क्या पाया क्या खोया है…अंजू जी आपके द्वारा रची एक .अति सुन्दर …रचना है जो ….व्यक्त करती है … उस समय धारा को जो बहती जाती है.. उस समय के साथ कभी उलझते और कभी सुलझते संबंधो की व्यथा को…..ऐसे लिखती रहें ..और ..हमें ….मौका देती रहें …..ऐसे ही कुछ कहने का…..

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