क्या गुनाह है मेरा

क्या गुनाह है मेरा

क्या गुनाह है मेरा
खफा क्यों हो

दिल तोड़ने वाले
सितमगर बेवफा कहलायेगा
गम में रहकर भी
जीने कि कोई किरण
दिखाई नहीं देती है
क्या गुनाह है मेरा
खफा क्यों हो

जो हुए टूटे खिलौने को
फिर से जोड़ दे
यूँ ना मुझे पे तुजुर्बे करो
कुछ भीतर से कुछ बाहर से
मन जल जाएगा यदि अब टूटा तो
क्या गुनाह है मेरा
खफा क्यों हो

प्रेम का अन्य आधार नहीं है
स्मृतियों का शेष पड़ाव नहीं है
ना जाने कल कौन डगर होगी
अगली मंजिल कौन सी होगी
आ जाये मौत कि खबर
और मै पूंछु तुम से कि
क्या गुनाह है मेरा
खफा क्यों हो
(…कृति ….अंजु…(अनु..)

Anju Choudhary

प्रकाशित काव्य संग्रह: …’’क्षितिजा’’ ‘’ऐ री सखी’’ ‘’ठहरा हुआ समय’’ संपादन: १. “कस्तूरी” “अरुणिमा” ‘’पगडंडियाँ’’ ‘’गुलमोहर’’ ‘’तुहिन और गूँज’’ प्रकाशित साझा काव्य संग्रह में मेरी भी कविताएँ…….अनुगूँज, शब्दों की चहलकदमी,नारी विमर्श के अर्थ,सुनो समय जो कहता है,काव्य सुगंध, आकाश अपना अपना (सभी साँझा कविता संग्रह ) मुट्ठी भर अक्षर (साँझा कहानी संग्रह )…समाचार पत्र और पत्रिकाओं से जुडाव:

One thought on “क्या गुनाह है मेरा

  • September 17, 2010 at 12:14 PM
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    kya gunhaa hai mera…….khaffa se kyu ho

    waha……..jab apna koi ruth jaye tho kaisa lagta hai bahut acche se samjhti hai aap..dil se likhi gayi kavita

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