पारिवारिक पृष्ठभूमि यानि फैमिली बैक ग्राउंड शादी के लिए या किसी को जानने के लिए कहाँ तक औचित्य रखता है ?

आज के वक़्त में बहस का मुद्दा ….जिसका अर्थ है भी और नहीं भी ….यानी मानो तो गंगा जैसा तीरथ ….ना मानो तो रेगिस्तान जैसा मरुस्थल है इस दुनिया में संसकारो की परिभाषा | कहने और समझने की बहुत सी बाते …कहाँ से शुरू होंगी और कहाँ खत्म ..जिसका कोई अंत नहीं है |
आज का वातावरण और हम लोग.….एक समय था जब लोगो को एक दूसरे को जानने की इच्छा .रहती थी ..उनको समझें और उनके करीब आने की जिज्ञासा हम सब को करीब से किसी सूत्र में बांधे रखती थी |पर आज इस आधुनिकता के माहौल में सब कुछ बदल सा गया है | लोगो की सोच …रहन सहन …यहाँ तक की खान पान की सब आदते पहले वाले वक़्त से जुदा है …यहाँ तक की रिश्तो को देखने और परखने तक का नजरिया बदल गया है |
जिंदगी में कुछ सवाल अनसुलझे ही रहें तो बेहतर है ……और हम भी यही चाहते है की ये सवाल अनसुलझा ही रह जाएँ ,क्योंकि कहीं ना कहीं हम भी जानते है की अगर इस प्रश्न को सुलझाने की कोशिश की तो हम सबकी जिंदगी ही उलझ के रह जाएगी …नतीजा रिश्ते बिखरेंगे …सपने टूटेगें…और परिवार के रस्ते अलग अलग हो जाएँगे |

पारिवारिक पृष्ठभूमि….कहने को बहुत भारीभरकम शब्द …..दिल और दिमाग से माने तो कोई ना कोई इस बोझ तले खुद को महसूस करेगा …..और सबसे पहले दिमाग में उठाने वाले प्रश्न ये ही होंगे की …घर पे बड़ो के बुताबिक चलने की बंदिश …..अपने अधिकारों का हनन ….पर्दा प्रथा …..कोई रुदिवादी परिवार | क्या इन्ही विचारो से एक परिवार की नीव पड़ती है ? कहने वाले और मानने वाले ऐसा मानते है ….पर जहाँ तक मैंने आज की युवा पीडी को समझा है …उनकी सोच हम सब से अलग है ..सबसे जुदा | आज का वातावरण आज़ादी के साथ साथ खुले विचारो को ज्यादा महत्व देता है |किसी भी पारिवारिक पृष्ठभूमि.की नीव ..परिवार के लोगो की मानसिकता पर निर्भर करती है कि वो अपने परिवार पर और घर के हर सदस्य पर कितना विश्वास करते है |किसी भी परिवार के लिए उसकी सूख समृधी आपसी विचारो के तालमेल से आती है …एक ऐसा विश्वास जो घर का मुखिया अपने बच्चो की सोच में परिवर्तित करता है …तब सही मायनों में एक अच्छे परिवार की परिभाषा या पृष्ठभूमि तैयार होती है |

आज के प्रशन के मुताबिक किया गया सर्वेषण….जिन जिन दोस्तों से ये प्रश्न किया गया….. पारिवारिक पृष्ठभूमि यानि फैमिली बैक ग्राउंड शादी के लिए या किसी को जानने के लिए कहाँ तक औचित्य रखता है ?……..यहाँ मै अपने दोस्तों के जवाब से सहमत हूँ ..उनकी विचारधारा ….से खुद को अलग नहीं कर पाई हूँ और लगभग ….सबका एक ही जवाब आया की हम सब अपनी जिंदगी में ,अपने परिवार से…उसके दिए संस्कारों से बंधे है ..और इस बंधन में हम कोई घुटन..कोई बंदिश महसूस नहीं करते ..और आज के माँ बाप होने के नाते हम सब ये ही चाहते है कि ये ही संस्कार हम अपनी नई पीढ़ी को देकर जाये
ताकि वो खुद से अपने विचारो से एक नई पृष्ठभूमि को जन्म दे | पीढ़ी आज की हो या बीते वक़्त की ….इज्ज़त की नज़र से उसे ही देखा गया जो अपने संस्कारों से फलीभूत हुए और जिसका लाभ सबको मिला | जब एक नया रिश्ता जुड़ता है ..वो चाहे शादी के बंधन का हो या दोस्ती का ..सबसे पहले संस्कारों की ही चर्चा की जाती है |संस्कार से फलीभूत परिवार को आज भी इज्ज़त की नज़र से देखा जाता है …हर जगह उसकी चर्चा की जाती है | आज कल के वक़्त में भी एकल परिवार और सयुंक्त परिवार से आई लड़की और लडको में ये अंतर देखने को मिल जाएंगा …..जहाँ एकल परिवार के बच्चे जिद्दी ,मनमोजी और एकांत प्रिये होते है .. वहीँ सयुंक्त परिवार से सम्बन्ध रखने वाला बच्चा सबको साथ लेकर चलने में विश्वास रखता है ..उसके लिए परिवार के हर सदस्य की ख़ुशी उतनी ही मायाने रखती है ..जीतनी की उसकी अपनी ख़ुशी |
जिंदगी में कुछ सवाल अनसुलझे ही रहें तो बेहतर है ……और हम भी यही चाहते है की ये सवाल अनसुलझा ही रह जाएँ ,क्योंकि कहीं ना कहीं हम भी जानते है की अगर इस प्रश्न को सुलझाने की कोशिश की तो हम सबकी जिंदगी ही उलझ के रह जाएगी …नतीजा रिश्ते बिखरेंगे …सपने टूटेगें…और परिवार के रस्ते अलग अलग हो जाएँगे |

अंत में ये ही कहूंगी की ..सोच अपनी अपनी ….पसंद अपनी अपनी |

(((अंजु चौधरी…….(अनु))))

Anju Choudhary

प्रकाशित काव्य संग्रह: …’’क्षितिजा’’ ‘’ऐ री सखी’’ ‘’ठहरा हुआ समय’’ संपादन: १. “कस्तूरी” “अरुणिमा” ‘’पगडंडियाँ’’ ‘’गुलमोहर’’ ‘’तुहिन और गूँज’’ प्रकाशित साझा काव्य संग्रह में मेरी भी कविताएँ…….अनुगूँज, शब्दों की चहलकदमी,नारी विमर्श के अर्थ,सुनो समय जो कहता है,काव्य सुगंध, आकाश अपना अपना (सभी साँझा कविता संग्रह ) मुट्ठी भर अक्षर (साँझा कहानी संग्रह )…समाचार पत्र और पत्रिकाओं से जुडाव:

6 thoughts on “

  • April 6, 2011 at 4:03 PM
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    अनु,पारिवारिक पृष्ठभूमि ,चाहे वह एकल परिवार हो या संयुक्त परिवार,अपना प्रभाव दिखाता ही है.छोटे और सीमित परिवार में विकास की परिधि निश्चित रूप से छोटी होती है जबकि संयुक्त परिवार काफी बड़ी.गुणों के आदान-प्रदान का दायरा भी बड़ा होता है,इसलिए गुणों का ग्रहण क्षेत्र भी व्यापक होता.अतः मेरा तो मानना है कि पारिवारिक पृष्ठभूमि किसी को जानने का आज भी सर्वोत्तम पैमाना है.

  • April 6, 2011 at 7:02 PM
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    koi burai najar nhi aati, aakhir jis family se aapne sambandh banana he jindgi bha rka, uske abre kuch gya ho jaye to koi burai nhi!

  • April 6, 2011 at 9:52 PM
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    सार्थक पोस्ट जिन्दगी के आसपास घुमती हुई , बहुत अच्छी लगी, बधाई

  • April 25, 2011 at 3:57 PM
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    सवाल बढ़िया है पर सबके विचार अलग ही होंगे…संयुक्त परिवार की अपनी प्रोब्लम्स होती हैं और एकल की अपनी…पर जहाँ तक संस्कारो की बात है …परिवार छोटा हो या संयुक्त ,,कोई भी अपने बच्चो को गलत संस्कार देना नहीं चाहेगा…अब आज कल इतने मर्डर ,,,रेप ,,बोम बलास्ट हो रहे हैं…जो लोग कर रहे हैं उनके माँ बाप को तो पता भी नहीं होगा के उनका बच्चा इसमें शामिल है…
    बस भगवान से यही दुआ करें की इंसान को ख़ुद गलत और सही फैसला करने की हिम्मत दे…हिंदुस्तान के संस्कारों को पहचाने और मान दें.

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