कोलाज़

जितना मैं तुम्हें सोचता हूँ
उतना ही,दीवानगी से
जाने-अनजाने में
तुम से,जुड़ता चला जाता हूँ

इस समाज के लिए
तुम्हारे अंदर के क्रोध को
जिस से तुम पल-पल लड़ती हो…

मन की ज्वाला
अग्नि सी तपती तुम
अपने ही भीतर
सबके दर्द को महसूस कर
सबसे छिपा कर
जिंदगी,जीने का गुर
जानती हो तुम…

ओ! मेरी सुंदर कोलाज़
पूर्ण निरीक्षण कर
सबके अधिकारों के लिए
लड़ती हो
बन कर एक विद्रोही
दहकती हो
बनकर ज्वालमुखी
जात-पात के अन्तर पर
भूर्ण-हत्या की विरोधी
बेटी-बेटे को समान
समझने वाली
मेरे सप्त-रंगों की अधिकारणी
बिना भेद-भाव
हर किसी को ,
हर रंग-रूप में
अपनाने वाली
मेरे जीवन का अद्धभुत
कोलाज़ हो तुम |

कभी रिक्शेवाला
कभी कामवाली बाई
कभी माली
तो कभी वो तुम्हारा
गाड़ी धोने वाला,
कभी ड्राईवर,
कभी सड़क से गुज़रता कोई
गरीब रहीगर
या कभी कोई जरूरतमंद
मेरे सामने आ कर
तुम्हारी तारीफ़ करता है तो
उसकी कही बातों
और तुम्हारी यादों संग
सोचता रहता हूँ तुम्हें
उनके प्रति तुम्हारे
सुख-दुःख
पीड़ा,प्यार,आभास,
उन्हें कुछ भी दे देने की लालसा
और सबसे ज्यादा
तुम्हारा यूँ ,
जिंदगी को जीने का ढंग
कि हर रात के बाद
एक नया दिन आता है
और वो भी गुजर जाता है
अपने अंधकार और प्रकाश
के साथ….

और फिर भी
तुम जुटी रहती हो
अपने नए जोश के साथ
उन सबके साथ
जिन्हें तुम्हारी
सबसे ज्यादा जरुरत है
और मुझे गर्व है कि
तुम सबके लिए
एक सी मुस्कान लिए
तत्पर हो सिर्फ उनके लिए …

औरत…
एक जीवन का सागर
जिसकी गहराई को
आज तक कोई नाप नहीं पाया,
और मैंने…
मेरी खोजी हुई
तुम्हारी पीड़ाओं संग
खुद को आज भी जोड़ा हुआ है
अपने जीवन के
बेहतरीन कोलाज़ के साथ ||

अंजु चौधरी (अनु)

Anju Choudhary

प्रकाशित काव्य संग्रह: …’’क्षितिजा’’ ‘’ऐ री सखी’’ ‘’ठहरा हुआ समय’’ संपादन: १. “कस्तूरी” “अरुणिमा” ‘’पगडंडियाँ’’ ‘’गुलमोहर’’ ‘’तुहिन और गूँज’’ प्रकाशित साझा काव्य संग्रह में मेरी भी कविताएँ…….अनुगूँज, शब्दों की चहलकदमी,नारी विमर्श के अर्थ,सुनो समय जो कहता है,काव्य सुगंध, आकाश अपना अपना (सभी साँझा कविता संग्रह ) मुट्ठी भर अक्षर (साँझा कहानी संग्रह )…समाचार पत्र और पत्रिकाओं से जुडाव: