हमारे बुज़ुर्ग लोग कहते हैं कि बेटी धान की खेती की तरह होती है |वह परायाधन या किसी दूसरे की

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बचपन हमारा

बचपन हमारा खुले खेत ..कच्ची पगडण्डीखेतो में पानीलगती फसलउस राहा…भागताबचपन हमारा पेड़ पर झूलारुक कर उस में ..झूलता बचपन हमाराअमुया

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मै……. मै हसंती बहुत हूँ नाथोड़ी सी पागल ,थोड़ी सी दीवानीथोड़ी सी शोखीसे भरीफिर उसी पलकुछ उदास सीथोड़ी थोड़ीनादान सीओर

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मेरा व्योम अर्थ नहीं होता है कोईअर्थ से टूटी भाषा कातार तार कर संकू मौन कोकेवल इतना शोर तोसुबह का

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